शहीदी दिवस के मौके पर देखिए भारत का आखिरी रेलवे स्टेशन, जहां साल में केवल दो दिन आजादी की लड़ाई में देश पर कुर्बान होने वालों के लिए ट्रेन दौड़ती है। यहां उनकी याद में एक मेला लगाया जाता है।
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हुसैनीवाला बॉर्डर
ये है भारत-पाक सीमा पर स्थित हुसैनीवाला बॉर्डर, जहां के लिए पूरे साल में दो दिन, 23 मार्च को और 13 अप्रैल को फिरोजपुर से एक स्पेशल ट्रेन चलती है। फिरोजपुर से लेकर हुसैनीवाला बॉर्डर तक यह स्पेशल ट्रेन 10 किलोमीटर का सफर तय करती है। हुसैनीवाला बॉर्डर स्थित शहीदी स्मारक पर हर साल की तरह इस बार भी 23 मार्च को शहीदी मेला लगने जा रहा है। डिप्टी कमिश्नर चंद्र गैंद ने हुसैनीवाला बॉर्डर पहुंच कर मेले की तैयारियों का जायजा लिया।
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हुसैनीवाला बॉर्डर
डिप्टी कमिश्नर चंद्र गैंद ने बताया कि 23 मार्च को फिरोजपुर छावनी रेलवे स्टेशन और सिटी रेलवे स्टेशन से लोगों की सुविधा के लिए सुबह 9 से शाम 6 बजे तक स्पेशल ट्रेनें चलाई जाएंगी। दिनभर में 12 स्पेशल ट्रेनें चलेंगी। छह ट्रेनें हुसैनीवाला बॉर्डर जाएंगी और छह उधर से शहर की तरफ वापस आएंगी। पंजाब रोडवेज के जीएम को फिरोजपुर कैंट और सिटी से स्पेशल बसों का इंतजाम करने को कहा गया है। ये बसें सिर्फ मेले में जाने वाले लोगों के लिए चलाई जाएंगी।
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हुसैनीवाला बॉर्डर
बता दें कि एक समय में ये रेल लाइन हुसैनीवाला से होकर लाहौर तक जाती थी, पर पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के दौरान यह रेल मार्ग बंद कर दिया गया। यहां सतलुज दरिया पर बने रेल पुल को भी तोड़ दिया गया। अब फिरोजपुर से हुसैनीवाला में ही आकर रेल लाइन खत्म हो जाती है। रेलवे ट्रैक को ब्लॉक करके यहां लिखा गया है - द एंड ऑफ नार्दर्न रेलवे।
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हुसैनीवाला बॉर्डर
फिरोजपुर शहर से 10 किलोमीटर दूरी पर बने हुसैनीवाला बॉर्डर पर शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की समाधि है। इस समाधि पर 23 मार्च को हर साल मेला लगता है। यहां के मेले में खुद पीएम मोदी भी आए थे। बहुत कम लोग जानते होंगे कि हुसैनीवाला स्थित समाधि स्थल 1960 से पहले पाकिस्तान के कब्जे में था। जन भावनाओं को देखते हुए 1950 में तीनों शहीदों का समाधि स्थल पाक से वापस लेने की कवायद शुरू हुई।
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हुसैनीवाला बॉर्डर
करीब 10 साल बाद फाजिल्का के 12 गांव व सुलेमान की हेड वर्क्स पाकिस्तान को देने के बाद शहीद त्रिमूर्ति से जुड़ा समाधि स्थल भारत को मिल गया। सतलुज दरिया के करीब बने इस समाधि स्थल को अब पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित किया गया। भारत-पाक बॉर्डर पर बने तीनों शहीदों के इस समाधि स्थल पर एक बोर्ड लगा है। इस बोर्ड पर ये जानकारी अंकित है कि फांसी के बाद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के शवों के साथ अंग्रेज किस बेरहमी से पेश आए।
अंग्रेज पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या के दोष में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई तो इसके विरोध में पूरा लाहौर बगावत के लिए उठ खड़ा हुआ। डरी हुई ब्रिटिश सरकार ने निश्चित तारीख से एक दिन पहले 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजे तीनों को फांसी दे दी। उसके बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शवों के टुकड़े करके अंग्रेज उन्हें लाहौर जेल की पिछली दीवार तोड़कर सतलुज दरिया के किनारे लाए और रात के अंधेरे में यहां बिना रीति रिवाज के उन्हें जला दिया।