जिस पराली को जलाने को लिए किसानों को समस्या झेलनी पड़ती है, उस पराली से चीनी और अल्कोहल बनाई जा सकती है, जानना चाहेंगे कैस बनेगी तो देखिए।
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parali
पराली से चीनी और अल्कोहल बनाने की रासायनिक प्रक्रिया (हाइड्रोलिसिस) का प्रयोगशाला में सफल परीक्षण हो चुका है। इस प्रक्रिया में 400 ग्राम पराली से अधिकतम 167 ग्राम चीनी का उत्पादन हो सकता है। वहीं एक किलो पराली से 220 ग्राम या 283 मिलीलीटर इथेनॉल का उत्पादन हो सकता है। इस प्रक्रिया को अपनाकर जहां फसल अवशेष का सही प्रबंधन हो सकेगा वहीं पराली जलने से होने वाले प्रदूषण की समस्या का भी समाधान होगा।
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पराली जलाने के बाद उड़ता धुआं
- फोटो : अमर उजाला
महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी रोहतक का फार्मेसी डिपार्टमेंट चीनी और अल्कोहल उत्पादन के लिए पराली की उपयोगिता जांच रहा है। हर साल अक्तूबर शुरू होते ही धान की कटाई के साथ ही खेतों में बड़े स्तर पर पराली जलाई जाती है। प्रति टन पराली जलाने से 60 किलोग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 460 किलोग्राम कार्बन डाईऑक्साइड और दो किलोग्राम सल्फर डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। बड़े स्तर पर धुएं का उत्सर्जन होने से प्रदूषण का स्तर कई गुणा बढ़ जाता है।
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पराली जलाना
तमिलनाडु के बायोटेक्नोलॉजी के प्रो. के. सुब्राह्मण्यम् की रिसर्च व अन्य देशों में हुए शोध के आंकड़ों के संबंध में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक के फार्मेसी डिपार्टमेंट के एचओडी प्रो. मुनीष गर्ग न जानकारी दी। प्रो. गर्ग ने बताया कि पराली में प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस और मिनरल होता है। इसकी नीचे वाली डंडी में लिगनोसेलुलोज पाया जाता है, जो शुगर प्रोडक्शन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
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पराली जलाना
पराली को एक घंटे की एसिड ट्रीटमेंट के बाद शुगर कंटेंट खमीर बनता है और शुगर तैयार की जाती है। खास बात यह है कि जब शुगर के किसी प्रोडक्ट का खमीर बनता है तो उसमें से अल्कोहल भी उत्पादित होता है। इसकी अलग प्रक्रिया है। पराली की डंडी से सबसे पहले सेलुलोज निकालकर ग्लुकोज और फिर एथेनॉल से अल्कोहल बनाया जा सकता है।
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पराली जलाना
पराली से होता है इतना प्रदूषण
एक टन पराली जलाने पर तीन किग्रा पार्टिकुलेट मैटर, 60 किग्रा कार्बन मोनोऑक्साइड, 460 किग्रा कार्बन डाईऑक्साइड, 199 किग्रा राख और दो किग्रा सल्फर डाईऑक्साइड पैदा होती है। जो सांस के साथ शरीर में पहुंचती है और नुकसान पहुंचाती है। पराली में सिलिका के कारण पशु इसे हजम नहीं कर पाते। हालांकि पत्ती को अलग कर यदि पशु को डंडी खिलाई जाए तो उसमें प्रोटीन, कैल्शियम और फास्फोरस समेत कई पोषक तत्व होते हैं।
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पराली जलाना
क्या है हाइड्रोलिसिस
उच्च तापमान और दबाव पर डिल्यूट सल्फयूरिक एसिड से राइस स्ट्रॉ (पराली) की हाइड्रोलिसिस प्रक्रिया से चीनी का उत्पादन किया जाता है। यह प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है। प्रक्रिया 10-आई रिएक्टर में 30-120 मिनट रिटेंशन टाइम, 10-35 बार दबाव और 0-1 फीसदी एसिड कंसन्ट्रेशन पर पूरी होती है। प्रक्रिया में श्रेष्ण परिणाम तब सामने आते हैं जब 0.5 फीसदी सल्फयूरिक एसिड पहले ही हर चरण में संकलित किया जाता है।
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पराली जलाना
कितनी मात्रा होती है प्राप्त
हाइड्रोलिसिस पराली के प्रबंधन और इसके प्रभावी उपचार से चीनी उत्पादन का एक कारगार माध्यम है। हाइड्रोलिसिस प्रक्रिया प्रति 400 ग्राम पराली से 167 ग्राम चीनी उत्पादन करने में सक्षम है, जोकि कुल मात्रा का 41.7 फीसदी है। इस प्रक्रिया में बचे अवशेष को फिर से हाइड्रोलिसिस प्रक्रिया से गुजारा जा सकता है, या फिर रॉ मैटेरियल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
एमडीयू भी करेगा शोध
पराली को लेकर लोगों को जागरूक होने की जरूरत है। फार्मेसी विभाग भी पराली को प्रयोग में लाने पर शोध करेगा। इसके लिए योजना बनाई जा रही है। इसीलिए इससे जुड़े हर पहलू को जांचा जा रहा है।
- प्रो. मुनीष गर्ग, एचओडी, फार्मेसी डिपार्टमेंट, एमडीयू