इच्छामृत्यु की वसीयत लिखने वाले पति-पत्नी
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प्रोफेसर पति-पत्नी डीएन जौहर (71) व उनकी पत्नी प्रोफेसर आदर्श जौहर (63) ने अपनी इच्छामृत्यु की वसीयत लिख डाली है। उन्होंने अपनी वसीयत ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट चंडीगढ़ को दे दी है।
इस वसीयत के मुताबिक, उन्होंने कहा है कि यदि वे भविष्य में गहरे कोमा में चले जाते हैं या किसी ऐसी बीमारी का शिकार हो जाते हैं कि ठीक नहीं हो सकते, तो उन्हें कृत्रिम लाइफ सपोर्ट सिस्टम से ज़िंदा ना रखा जाए। बल्कि उन्हें प्राकृतिक तौर पर सम्मान से मरने का अधिकार दिया जाए। यह न हो कि उनका जीवन जबरदस्ती आगे बढ़ाया जाए।
प्रोफेसर डीएन जौहर आगरा स्थित डा. बीआर अंबेडकर यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर व पंजाब यूनिवर्सिटी लॉ डिपार्टमेंट के पूर्व चेयरमैन रहे हैं, जबकि प्रोफेसर आदर्श जौहर सेक्टर 11 कालेज की बॉटनी विभाग के विभागाध्यक्ष पद से रिटायर हैं।
जिला अदालत में मौजूद दंपती ने बताया कि दो पेज के दस्तावेज को तैयार करने में पूरे नौ महीने लग गए हैं। डा. जौहर पूरी तरह से फिट हैं और रोजाना दस घंटे पढ़ाई-लिखाई करते हैं। उन्होंने कहा कि उनके फैसले में उनके बच्चों की स्वीकृति है।
इसलिए लिया निर्णय
इस बारे में प्रोफेसर जौहर कहते हैं कि यह मेरे अकादमिक अभ्यास का एक हिस्सा है। उनके एक छात्र ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर पीएचडी भी की है। उन्होंने कहा कि वे पेशे से एक शिक्षक हैं और उन्हें अपने छात्रों का रोल मॉडल बनना चाहिए। उन्होंने अपने निर्णय लेने के तीन कारण बताए। पहला, गरिमा के साथ मरने का अधिकार। दूसरा मेरे अंग किसी दूसरे के काम आएं और तीसरा मेरा शरीर मेडिकल क्षेत्र में रिसर्च के लिए काम आए।
क्या है इसकी प्रक्रिया
पिछले साल सुप्रीमकोर्ट के फैसले के मुताबिक यदि दोनों दंपती में से कोई बीमार पड़ने के बाद अस्पताल में दाखिल होता है और डॉक्टर यदि घोषित कर देते हैं कि उनके बचने के आसार नहीं हैं तो उसकी रिपोर्ट यहां के डीसी के पास जाएगी। उसके बाद डीसी एक और मेडिकल बोर्ड गठित करेंगे। मेडिकल बोर्ड अस्पताल में दाखिल मरीज की दोबारा से जांच रिपोर्ट तैयार करेगा। यदि दोनों रिपोर्ट एक सामान आती हैं तो मरीज का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा दिया जाएगा। यदि रिपोर्ट में कुछ अंतर होगा तो इसका फैसला हाईकोर्ट करेगा।
क्या होती है इच्छामृत्यु
इच्छामृत्यु के मामले दो तरह के होते हैं। एक निष्क्रिय इच्छा मृत्यु और दूसरी सक्रिय इच्छा मृत्यु। यदि कोई मरीज वेंटिलेटर पर है यानी उसका शरीर खुद को जिंदा रखने में सक्षम नहीं है, बल्कि मशीनों की मदद से उसका दिल काम कर रहा है तो निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में धीरे-धीरे लाइफ़ सपोर्ट को कम किया जाता है। वेंटिलेटर बंद किए जाते हैं। इससे व्यक्ति की प्राकृतिक मृत्यु हो जाती है।
सक्रिय इच्छा मृत्यु में मरीज ठीक है, लेकिन उसे लाइलाज़ बीमारी है, जिससे घर के लोग और मरीज बहुत परेशान हो चुके हैं और वह मरना चाहता है तो इसमें वह डाक्टर से अनुरोध कर उसे जहरीला इंजेक्शन देकर मार दिया जाता है, लेकिन सक्रिय इच्छामृत्यु को भारत में गैरकानूनी करार दिया गया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक किसी को भी इसलिए जहरीला इंजेक्शन नहीं दिया जा सकता कि वो दर्द नहीं सहन कर पा रहा है या आर्थिक हालात की वजह से इलाज नहीं करा सकता। ये आत्महत्या के बराबर होगा।
हम लोगों को सम्मान से मरने का अधिकार होना चाहिए। यह मेरा अधिकार है और मैं होशो हवास में ही अपनी वसीयत लिख रहा हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरी जिंदगी जबरदस्ती घसीटी जाए।
- प्रोफेसर डीएन जौहर