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'सुपरकॉप' गिल का वो ऑपरेशन, जिसने तोड़ दी आतंक की कमर, अपना एक भी जवान नहीं खोया

Sat, 27 May 2017 09:22 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, चंडीगढ़
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केपीएस गिल दो बार बनें पंजाब पुलिस के मुखिया - फोटो : Getty Images
केपीएस गिल, ये नाम देश कभी भूला नहीं पाएगा। कंवर पाल सिंह गिल का 82 साल की उम्र में निधन हो गया। गिल पंजाब के दो बार डीजीपी रह चुके हैं। इन्होंने सबसे बड़ा कामयाब ऑपरेशन अंजाम दिया था।
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80 के दशक में पंजाब आतंकवाद की आग में झुलस रहा था। खालिस्तान की मांग जोरों पर थी और उसकी आड़ में दहशत का खुला खेल खेला जाता था। धार्मिक स्थलों में शरण लेने का चलन भी ज़ोरों पर था। 1984 का ऑपरेशन ब्लू स्टार कौन भुल पाया है। जिसकी वजह से देश ने एक प्रधानमंत्री को खो दिया।
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इसके बाद 1988 में अमृतसर के स्वर्णमंदिर में ही एनएसजी ने दो और ऑपरेशन किए थे। ऑपरेशन ब्लैक थंडर और ऑपरेशन ब्लैक थंडर – 2। 9 मई 1988 को शुरू हुआ ये ऑपरेशन 18 मई 1988 तक चला. इसमें 41 आतंकवादी मारे गए। ख़ास बात ये कि सुरक्षाबलों में से एक की भी जान नहीं गई. ना ही किसी सिविलियन की मौत हुई, और तो और, ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद जिस तरह विरोध के स्वर पूरे पंजाब भर में मुखर हुए थे, वैसा कुछ इस बार नहीं हुआ। ये ऑपरेशन इस मामले में भी अनोखा था कि प्रेस को इसे कवर करने के लिए पूरी छूट दी गई. इसलिए अफवाहों का बाज़ार भी गर्म न हो सका।

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खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स के स्वयंभू लेफ्टिनेंट जनरल मलकियत सिंह ने धमकी जारी की थी कि स्वर्णमंदिर में घुसने के पहले हजारों सैनिकों को भूनकर रख दिया जाएगा। उसके शब्द थे, “रिबेरो से कह दो अपने लोगों की लाशें उठवाने के लिए ट्रक मंगा ले, हज़ारों लाशें उठानी होंगी.” लेकिन ऑपरेशन ख़त्म होने के बाद का नज़ारा कुछ और ही था।
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इस ऑपरेशन की कामयाबी का सेहरा पंजाब के तत्कालीन डीजीपी के पी एस गिल के सर बांधा जाता है। उन्होंने इसके लिए करीब दो महीने तक तैयारियां की थीं। जवानों को मुकम्मल तैयारी के बावजूद सब्र रखने को कहा गया था। मानेसर में एनएसजी के मुख्यालय में कमांडोज को विशेष प्रशिक्षण दिया गया. हेलिकॉप्टर से कूदकर मकानों से कब्ज़ा हटाने का अभ्यास कराया गया। एक बार ऑपरेशन को हरी झंडी मिलते ही एनएसजी हरकत में आ गई. विमानों से लगभग 1000 कमांडोज को अमृतसर पहुंचाया गया।
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 सबसे पहले मोर्चे पर डटे छिपकर गोलियां दागने वाले निशानेबाज़, इनका एक जोड़ा गुरु रामदास सराय के पीछे बनी 300 फीट ऊंची पानी की टंकी पर चढ़ गया। वहां से वो हरमिंदर साहिब की मीनारों पर बैठे आतंकवादियों से भी ज़्यादा बेहतर पोजीशन में आ गए। उनको हल्के में लेने का खामियाज़ा पंथक कमिटी के प्रवक्ता जागीर सिंह को भुगतना पड़ा। वो पानी पीने के लिए कमरे से बाहर निकला तो जवानों ने उसका भेजा उड़ा दिया।
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 उसे अंदर खींचने के लिए एक और आतंकवादी ने बाहर झांका, तो उसका भी वही हश्र हुआ। उसके बाद किसी की हिम्मत नहीं हुई बाहर निकलने की। इस शुरुआती प्रहार ने ही आतंकवादियों की आधी हिम्मत पस्त कर दी। जागीर सिंह को मार गिराने के बाद निशानेबाजों ने दबाव बनाए रखा और तीन दिनों में बीस से ज़्यादा आतंकवादी मार गिराए।
 

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कुछ आतंकवादी मीनारों पर जमे बैठे थे। एनएसजी ने उनसे निपटने के लिए अलग रणनीति अपनाई। भारी मशीनगनों से मीनारों पर हज़ारों गोलियां बरसाई गईं। बाद कमांडो 84 मिमी व्यास के गोले फेंकनेवाली ‘कार्ल गुस्ताव’ राइफल ले के आए।  उनसे उन गोल घेरों पर टैंक निरोधक गोले बरसाए गए. इससे मीनारों पर बड़े-बड़े छेद हो गए। इन छेदों में से आंसू गैस के गोले अंदर फेंके गए। जब धुआं बाहर निकलने लगा तो कमांडो घात लगा कर बैठ गए कि अब आतंकवादी बाहर की ओर निकलेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि वो पहले ही भाग चुके थे।
 

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इधर ये कार्रवाई चल ही रही थी कि उधर स्पेशल एक्शन ग्रुप के छापामार सदस्यों ने अपनी ख़ास काली पोशाक पहन कर मंजी साहब और नए लंगर की इमारतों पर कब्ज़ा करना शुरू किया। चौतरफा दबाव का नतीजा ये निकला कि 15 मई की शाम में 146 लोग सर पर हाथ उठाए बाहर निकले। लेकिन ये कामयाबी अधूरी थी। सरेंडर किए गए लोगों में सुरजीत सिंह पेंटा जैसा महत्वपूर्ण आतंकवादी भी था, जिसने प्रेस को देखते ही साइनाइड खा लिया। एक और जनसमूह जो सरेंडर की अपील सुनकर परिक्रमा के कमरों से बाहर निकला था, तेज़ी से हरमिंदर साहिब में घुस गया।
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तत्काल उनसे निपटने की नई रणनीति बनने लगी। कुछ लोग तुरंत कार्रवाई के पक्ष में थे लेकिन गिल ने इंतज़ार करने का फैसला किया। इस बीच लगातार मानसिक दबाव बनाया गया, प्रसिद्ध सिख संत बाबा उत्तम सिंह को लाया गया, जिन्होंने आतंकवादियों से लगातार समर्पण की अपीलें की। आखिरकार 18 मई की डेडलाइन निर्धारित की गई, वो ख़त्म होने से पहले ही बचे हुए 46 आतंकवादी बाहर आ गए।  इस तरह से ये ऑपरेशन ख़त्म हुआ। 9 दिन तक चला ये ऑपरेशन सुरक्षाबलों के इतिहास में उन चुनिंदा अभियानों में से एक के तौर पर दर्ज है, जो पूरी तरह से कामयाब रहे।
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