पटियाला रियासत के महाराजा भूपिंदर सिंह शराब और शबाब के बहुत शौकीन थे। उनके शाही महल में बने स्विमिंग पूल में रातभर ये कर्मकांड चलते थे। देखिए, भाग दो।
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महाराजा का स्विमिंग पूल, यहां रोजाना रंगीन होती थीं रातें
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पटियाला स्थित लीला भवन के पास बने इस स्विमिंग पूल पर होने वाली इन गतिविधियों का जिक्र महाराजा भूपिंदर सिंह के दीवान जरमनी दास ने अपनी किताब 'महाराजा' में किया है। इसमें बारीकी से बताया गया है कि स्विमिंग पूल में रोजाना कैसे रंगीन होती थीं रातें।
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गर्मी के मौसम में इस स्विमिंग पूल पर ज्यादा रौनक रहती थी। पानी गर्म होता तो उसे ठंडा करने के लिए बर्फ़ की बड़ी-बड़ी सिलियां मंगाकर उसमें डलवा दी जातीं। बर्फ की सिलियों पर औरतें शराब के ग्लास लिए तैरने लगती थीं। औरतों के बदन की खुशबू से पूल का पानी महक उठता था और हवा में मस्ती छा जाती थी।
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वह खुशनुमा नजारा देखते ही बनता था जब निहायत बारीक और भीनी, तैरने की पोशाकें पहने हुए 50-60 औरतें बर्फ़ की सिलियों पर लेटी तैरती हुईं आतीं और श्ाराब के जाम से नाश्ता पेश करती थीं। कभी-कभी ये पार्टियां सारी रात चला करती थीं। कुछ मर्द-औरतें तालाब में साथ-साथ नहाते, कुछ गाते और नाचते रहते।
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स्विमिंग पूल के किनारे पेड़ों की डालों पर बैठी हुई कुछ औरतें धीमी आवाज़ में गीत गुनगुनाया करतीं। आमतौर पर ऐसी रंगरलियां या तो गर्मी के मौसम में या बरसात में मनाने का दस्तूर था। सुबह से शाम तक खाने पीने का दौर बे-रोकटोक चला करता। लंच या डिनर में खाने की लजीज से लजीज चीजें परोसने का का़यदा था।
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महल के मर्द ख़िदमतगार और ड्यूटी पर तैनात अफ़सरान या फौ़जी सन्तरी महल खास से एकदम अलग दूसरी कोठी में रखे जाते थे। उनसे बातचीत या तो टेलीफोन पर होती या किसी पाशीदा सुरंग के रास्ते उन तक संदेशा पहुंचाया जाता। इन पौशीदा रास्तों पर 80 साल से भी ज्यादा उम्र के सफे़द दाढ़ी वाले सन्तरियों का सख्त पहरा रहता था।
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वे लोग जरूरत के वक्त महाराजा का ह़ुक्म ड्यूटी पर तैनात अफसरों तक पहुंचाया करते थे। रंगरलियों में शरीक होने वाली महारानियों और रानियों की मोटरें खास महल के अन्दर तक चली आती थीं। रियासत के अफसरान और महाराजा के परिवार के लोगों की मोटरों को सिर्फ महल के फाटक तक आने की इजाजत थी।
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इन जलसों में विलायती या गै़र-हिन्दुस्तानी लोग बहुत कम बुलाए जाते थे। सिर्फ़ वही यूरोपियन या अमेरिकन लेडी, जो उन दिनों महाराजा के मोती बाग पैलेस में मेहमान की हैसियत से ठहरी होती और जिसके साथ महाराजा की इश्कबाजी चलती होती, इन रंगरलियों में शरीक की जाती थीं।