लगता है इस इंटरनेशनल पहलवान के लिए 'लेडी लक' काम कर गया, क्योंकि जब से घर में उनके पांव पड़े हैं, खुशियां ही खुशियां छा गई हैं। जानिए आखिर क्या कहानी है।
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पहलवान सत्यव्रत कादियान
- फोटो : अमर उजाला
दरअसल, हम बात कर रहे हैं पहलवान सत्यव्रत कादियान की। इन्हें अर्जुन अवार्ड देने की घोषणा की गई है। उन्हें प्वाइंट के आधार पर अर्जुन अवार्ड के लिए चुना गया है। अर्जुन अवार्डी के लिए नाम फाइनल होते ही पूरे परिवार में खुशी की लहर है। परिजन खुशी से फूले नहीं समा रहे, वहीं इस खुशी का श्रेय ओलंपिक मेडलिस्ट पहलवान साक्षी मलिक को दिया जा रहा है, जो सत्यव्रत की पत्नी हैं।
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पहलवान सत्यव्रत कादियान
- फोटो : फाइल फोटो
सत्यव्रत की शादी साक्षी मलिक के साथ इसी वर्ष अप्रैल में हुई थी। पति की इस उपलब्धि के बाद ओलंपियन साक्षी मलिक भी बेहद खुश हैं। साक्षी और सत्यव्रत फिलहाल शहर से बाहर गए हुए हैं। परिवार के लोगों ने भी फोन कर उन्हें बधाई दी। सत्यव्रत ने बताया कि उन्होंने अर्जुन अवार्ड के लिए उन्होंने अप्रैल माह में फार्म भरा था, जहां पर प्वाइंट के आधार पर उनका चयन किया गया। देर शाम उन्हें इसकी जानकारी मिली।
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पहलवान सत्यव्रत कादियान
- फोटो : फाइल फोटो
मूलरूप से कच्चा बेरी रोड के रहने वाले सत्यव्रत को पहली बार यूथ ओलिंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला था। उन्होंने 100 किग्रा भारवर्ग में कांस्य पदक जीता। रेलवे में बतौर टीई नियुक्त सत्यव्रत कादियान देश को राष्ट्रमंडल खेलों में भी मेडल दिला चुके हैं। सत्यव्रत को भीम अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। सत्यव्रत ने 97 से 100 किग्रा भारवर्ग में अपनी अलग पहचान बनाई।
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पहलवान सत्यव्रत कादियान
- फोटो : फाइल फोटो
सत्यव्रत के पिता अर्जुन अवार्डी सत्यवान कादियान अपना खुद का अखाड़ा चलाते हैं। सत्यव्रत को पिता ने बतौर कोच प्रशिक्षण दिया। कुश्ती के गुर सिखाए और अपनी तरह फ्री स्टाइल हैवीवेट वर्ग के लिए तैयार किया। सत्यव्रत फिलहाल 21 से 26 अगस्त तक पेरिस में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप की तैयारी में जुटे हैं। बकौल सत्यव्रत, वह 97 किलोग्राम भारवर्ग में खेलेंगे और साक्षी 60 किलोग्राम भारवर्ग में दमखम दिखाएगी।
सत्यव्रत का जन्म 9 नवंबर 1993 को रोहतक (हरियाणा) में हुआ। सत्यव्रत को कुश्ती विरासत में मिली। पिता अर्जुन अवॉर्डी सत्यवान कादियान ओलंपिक में देश को एक नाम, एक विशेष पहचान दिला चुके हैं, चाहते थे सत्यव्रत भी उनके पदचिन्हों पर चले। इसी के चलते बहुत छोटी उम्र में सत्यवान ने अपने पिता की अंगुली पकड़कर अखाड़ा जाना शुरू कर दिया था।