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इंदिरा गांधी मान लेतीं ये बात तो टल जाता 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' और न जाती उनकी जान

Sun, 17 Jun 2018 09:51 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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इंदिरा गांधी - फोटो : amar ujala
सिखों के पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर अमृतसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार अंजाम दिया गया तो उसके विरोध में इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई, ऐसा न होता अगर इंदिरा गांधी ऑपरेशन सनडाउन को मंजूरी दे देतीं, तो न ऑपरेशन ब्लू स्टार होता और न ही इंदिरा गांधी की जान जाती।
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indira gandhi
कहा जाता है कि इंदिरा की हत्या उस घटना के प्रतिशोध के रूप में की गई, जो उन्होंने सिखों के सबसे पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर में 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' के रूप में कराई थी। इसमें अकाल तख्त कब्जाए बैठे जरनैल सिंह भिंडरवाले पर कार्रवाई के लिए सेना को स्वर्ण मंदिर में घुसने की अनुमति दी गई थी।
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इंदिरा गांधी
लगभग डेढ़ दिन तक चले देश के इस पहले असैनिक युद्ध में जमकर खून बहा था और स्वर्ण मंदिर के पवित्र चबूतरे लोगों के खून से लाल हो गए थे। इस युद्ध में भिंडरवाला तो मारा गया लेकिन इसकी बड़ी कीमत देश और सेना को चुकानी पड़ी।  हमले में 83 के करीब सैनिक जिनमें तीन अफसर भी थे और 492 आम नागरिक मारे गए। ऑपरेशन खत्म हुआ तो स्वर्ण मंदिर के हर गलियारे में लाशों के ढेर पड़े थे।

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इंदिरा गांधी
मंदिर की दीवारें टैंकों के गोलों से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। 7 जून 1984 की सुबह हर तरफ मौत का मंजर था। इतिहास में स्वर्ण मंदिर में चले ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है और न जाने कितने पन्ने इस मनहूस ऑपरेशन के नाम पर स्याह हो चुके हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऑपरेशन ब्लू स्टार टल सकता था? और ऐसा होता तो शायद इंदिरा गांधी भी आज हमारे बीच हो सकती थीं।
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इंदिरा गांधी
असल में पंजाब में लगातार बढ़ रहे आतंकवाद और भिंडरवाले के देश विरोधी बयानों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चिंतित कर दिया था। इसी बीच 5 अक्टूबर, 1983 को सिख उग्रवादियों ने कपूरथला से जालंधर जा रही बस को रोक लिया। इसके बाद बस में सवार हिंदू सवारियों को चुन चुन कर गोलियों मारी गईं। इस घटना से इंदिरा गांधी गुस्से से भर उठीं।
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इंदिरा गांधी
घटना के अगले ही दिन उन्होंने पंजाब में कांग्रेस के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह की सरकार को भंग करके वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने भिंडरवाले और उसके साथियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का मूड़ बना लिया। उन्होंने रॉ के संस्थापक रामेश्वर नाथ काव और अपने सहयोगी आरके धवन से इस संबंध में चर्चा की।
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इंदिरा गांधी
इसके अलावा कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं के साथ चर्चा के दौरान इस पर सहमति बनी कि स्वर्ण मंदिर को भिंडरवाला समर्थकों से खाली कराने के लिए सेना की कार्रवाई की जाए। इसके लिए आधी रात में ऑपरेशन चलाया जाए। शुरूआती ना नुकुर के बाद इंदिरा भी इस ऑपरेशन के लिए मान गई, जिसका नाम रखा गया 'ऑपरेशन सन डाउन'। सरकार की तैयारियां पूरी थी और सेना की भी।

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इंदिरा गांधी
इस अभियान को चलाने का जिम्मा सौंपा गया मेरठ में 9 डिविजन में तैनात और 71 के युद्ध के हीरो रहे मेजर जनरल केएस बराड़ को। 'ऑपरेशन सनडाउन' के लिए सेना के खास कमांडों ने सहारनपुर जिले के सरसावा एयरफोर्स पर 20-22 दिन की विशेष ट्रेनिंग भी ली थी। ऑपरेशन सनडाउन के तहत सेना के जवानों को चुपचाप हेलीकॉप्टर से मंदिर के प्रांगण में उतरना था और आतंकियों को उनके अंजाम तक पहुंचाकर वापस लौट आना था।

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इंदिरा गांधी
'ऑपरेशन सनडाउन' को ऑपरेशन ब्लूस्टार के मुकाबले कम जोखिम भरा और आसान माना गया था। जैसे ही ऑपरेशन को शुरू करने का वक्त आया तभी इंदिरा गांधी ने सेनाध्यक्ष आरएस वैध से एक सवाल पूछा और अचानक इतने फुलप्रूफ प्लान को एक झटके में खारिज कर दिया। असल में इंदिरा ने पूछा था कि ऑपरेशन में कितने लोगों की जान जा सकती है, जिसके जवाब में बताया गया 30-40।

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इंदिरा गांधी
इंदिरा ने तुरंत इस अभियान के लिए मना कर दिया। वो नहीं चाहती थीं कि सिखों से सबसे पवित्र धर्मस्थल में कोई खून खराबा हो। कहा ये भी जाता है कि  राजीव गांधी भी इस पक्ष में नहीं थे कि स्वर्ण मंदिर पर सेना से हमला करवाया जाए। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था, इसलिए मात्र 30-40 लोगों की मौत की आशंका के चलते ऑपरेशन सन डाउन से इंकार करने वाली इंदिरा गांधी साढ़े पांच सौ से ज्यादा लोगों की मौत की गवाह बनीं।
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इंदिरा गांधी
असल में इंदिरा ने 'ऑपरेशन ब्लूस्टार' को भी सेनाध्यक्ष जनरल आरएस वैध के उस आश्वासन के बाद हरी झंडी दी थी, जिसमें उन्होंने सैनिक कार्रवाई में किसी के न मारे जाने की बात कही थी। कहा भी जाता है कि इस मुद्दे पर अधिकारियों ने इंदिरा गांधी को अंधेरे में रखा, जिसकी बहुत बड़ी कीमत देश को चुकानी पड़ी और इंदिरा गांधी के नाम पर भी धब्बा लगा। यहां तक कि उनकी जान चली गई।
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