हम पाकिस्तान के जासूस नहीं हैं, हमें न्याय और सम्मान चाहिए। भारतीय सेना में रह चुके इन फौजियों की आपबीती सुनिए, मामला कोर्ट में है।
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सेना कर्मियों की प्रेसवार्ता
करीब 43 साल पहले चर्चित सांबा जासूसी कांड में फंसे कई सैन्य अफसर आज भी अपने सम्मान और न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। हाईकोर्ट तक तो ये अफसर अपने पक्ष में केस जीत भी चुके हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इनका केस अभी विचाराधीन है। इन अफसरों का कहना है कि वे पाक के जासूस नहीं हैं, लेकिन फिर भी कुछ आर्मी अफसरों की मिलीभगत से उनके साथ रंजिशन ये कंलक जोड़ दिया गया।
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इसलिए उन्होंने अब अपनी अदालती लड़ाई के साथ-साथ इस केस की सच्चाई देश की जनता के समक्ष रखने का फैसला लिया है। इस संबंध में कुछ सैन्य अफसरों ने शुक्रवार को चंडीगढ़ प्रेस क्लब में प्रेसवार्ता कर इस केस की सच्चाई से जुड़े कई तथ्यों को सामने रखा। इस दौरान पाक जासूसी में फंसे वास्तविक जासूस को भी पेश किया गया, जिसके कहने पर कई सैन्य अफसरों को बाद में इस जासूसी कांड में फंसाया गया था।
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इन्हीं सैन्य अफसरों में से मुंबई निवासी मेजर एमआर अजमानी, नासिक निवासी एके राणा, गुरुग्राम निवासी कैप्टन आरएस राठौड़, गुरुग्राम निवासी कैप्टन जेएस यादव, नोएडा निवासी वीके दीवान व अंबाला के अधोया निवासी दौलतराम शर्मा ने प्रेसवार्ता के दौरान बताया कि ये मामला सन 1975 में शुरू हुआ था। इसमें उन्हे रंजिशन झूठा फंसाया गया था। इंटेलीजेंस ब्यूरो ने दो साल के सर्विलांस के बाद दो जवानों आया सिंह और सरवन दास को पाक जासूसी में पकड़ा था।
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इन्हें आईबी ने सेना के सुपुर्द किया गया। लेकिन इस दौरान एक जासूस सरवन दास भागकर पाक चला गया था और छह महीने बाद वहां से लौटकर उसे सरेंडर कर दिया था। पीड़ित सैन्य अफसरों ने बताया कि वे लौटकर इस बात को स्पष्ट कर चुका था कि इस जासूसी कांड में उसके और आया सिंह के अलावा दूसरा कोई शामिल नहीं है। लेकिन फिर भी कुछ अफसरों ने उन दोनों जासूसों को टार्चर कर रंजिशन कुछ और सैन्य अफसरों को भी फंसा दिया।
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इन अफसरों के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा था। सैन्य अफसरों ने बताया कि वे भी उनमें से एक हैं। प्रेसवार्ता में पेश हुए जासूस सरवन दास ने भी ये बात स्वीकार कि उसे ढाई साल तक यातनाएं देकर कई अफसरों के खिलाफ बयान करवाए गए। लेकिन वह आज भी यही कहना चाहता है कि इस जासूसी कांड में उसके और आया सिंह के सिवाए दूसरा कोई शामिल नहीं था। उसने अपने इस गुनाह की सजा काट ली है।
सैन्य अफसरों ने कहा कि वे लोग आज बुजुर्ग हो चुके हैं, लेकिन जासूसी का कलंक आज तक उनके माथे से हटा नहीं है। उनके अनुसार वे हाईकोर्ट में जीत चुके है और सुप्रीम कोर्ट में केस विचाराधीन है। उन्होंने कहा कि उनकी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मांग है कि वे संसद की एक ज्वाइंट कमेटी से इस पूरे मामले की जांच करवाकर उन्हे न्याय और सम्मान दिलवाए।