विजय दिवस के मौके पर मिलिए कारगिल के एक ऐसे योद्धा से, जो मरने के बाद जी उठा था और आज एक मिसाल बन चुके हैं। जानिए आखिर कैसे हुआ वीर सपूत का पुनर्जन्म।
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कारगिल के योद्धा मेजर डीपी सिंह
इस वीर बहादुर का नाम है मेजर डीपी सिंह। इन्हें फर्स्ट इंडियन ब्लेड मैराथन रनर के नाम से भी पहचाना जाता है। इन्होंने पहले मौत को मात दी और आज वे लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं, लेकिन उनके पुनर्जन्म की कहानी दिलचस्प है। डीपी सिंह हर साल 15 जुलाई को अपना पुनर्जन्म दिवस मनाते हैं। अभी वे 45 साल के हो चुके हैं, लेकिन जिंदगी के 18 साल कुछ दिन पहले ही पूरे किए हैं।
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कारगिल के योद्धा मेजर डीपी सिंह
कारगिल के युद्ध में डीपी सिंह बुरी तरह से घायल हो गए थे। उनका एक पैर भी कट चुका था। इलाज के दौरान उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था, लेकिन वह जी उठे। खुद डीपी सिंह बताते हैं कि 999 की बात है ये। करगिल युद्ध चल रहा था। एक ब्लास्ट हुआ। आठ किलोमीटर तक मेरे साथी मारे गए, उनके शव मेरी आंखों के सामने थे। मैं डेढ़ किलोमीटर ही दूर था। खून में सना हुआ था मैं। एक पैर तो वहीं गंवा चुका था। शरीर पर 40 गहरे घाव थे।
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कारगिल के योद्धा मेजर डीपी सिंह
मेरे साथी अपनी जान दांव पर लगाकर मुझे वहां से ले गए। बीच में पाक ऑक्यूपाइड नदी आई। एक साथी को ठीक से तैरना भी नहीं आता था। फिर भी मुझे अस्पताल पहुंचाया उन्होंने। किसी भी क्षण उन्हें गोली लग सकती थी, लेकिन उन्होंने मुझे यूं नहीं छोड़ा। डॉक्टर ने तो मुझे डेड डिक्लेयर कर दिया था। डीपी सिंह कहते हैं कि पर मेरी किस्मत में जीना लिखा था। उसी दिन एक सीनियर डॉक्टर हॉस्पिटल के दौरे पर थे और उनकी कोशिशों से मेरे शरीर में जिंदगी लौटी। वही से नई जिंदगी शुरू हुई। तब से हर 15 जुलाई को मैं अपना मृत्यु व जन्म दिवस मनाता हूं।
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कारगिल के योद्धा मेजर डीपी सिंह
मेजर कहते हैं कि मैंने इस नई जिंदगी की शुरुआत एक बच्चे की तरह की थी, लेकिन यात्रा कठिन थी। क्योंकि यहां कोई हाथ थामकर चलना सिखाने वाला नहीं था। पर मैंने खुद को सिर्फ जख्मों से उबरा, बल्कि 2009 में कृत्रिम पैर के सहारे चलना सीखा। बता दें कि इसके बार मेजर ने कृत्रिम पैर के सहारे मैराथन में दौड़ना शुरू किया। 21 किमी हॉफ मैराथन दौड़कर इतिहास बनाया और देश में उनसे पहले किसी ने अब तक ऐसा नहीं किया था। वह तीन मैराथन में हिस्सा भी ले चुके हैं।
मेजर सिंह दो बार लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज करा चुके हैं। सेना ने कृत्रिम पैर दिलाए, जिन्हें हम ‘ब्लेड प्रोस्थेसिस’ कहते हैं। इस कृत्रिम पैर का निर्माण भारत में नहीं होता और ये पश्चिमी देशों से मंगाने पड़ते हैं। मेजर सिंह एक संस्था चला रहे हैं- ‘दि चैलेंजिंग वंस’। साल 2011 में अपने जैसे कुछ लोगों के साथ मिलकर मेजर डीपी सिंह ने 'द चैलेंजिंग वन्स' नामक ग्रुप बनाया। वर्तमान में इस ग्रुप से करीब 800 लोग जुड़े हैं, जिनमें 90 सदस्य दौड़, स्वीमिंग, राइडिंग व पैरा ओलंपिक आदि में हिस्सा ले रहे हैं।