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पहली बारः वायुसेना ने फिर रचा इतिहास, बायोजेट इंधन से लेह पहुंचा एएन-32 विमान

Sat, 01 Feb 2020 01:33 AM IST
ajay kumar मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
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एएन-32 विमान। - फोटो : अमर उजाला
भारतीय वायु सेना के इतिहास में शुक्रवार को एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ गई है। लेह-लद्दाख के बर्फीली मौसम में भारतीय वायु सेना के एएन-32 विमान ने बायोजेट ईंधन के साथ लेह हवाई पट्टी पर लैंडिंग की है। ऐसा पहली बार हुआ है जब एएन-32 के दोनों इंजनों को बायोजेट ईंधन के साथ दुर्गम चोटी तक उड़ाया गया। शुक्रवार को विशेषज्ञों की निगरानी में और कुशल पायलटों के साथ चंडीगढ़ एयरफोर्स स्टेशन में इसके परफॉर्मेंस के आंकलन के बाद विमान ने उड़ान भरी।
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समुद्र तल से 10,682 फीट की ऊँचाई पर इस विमान को लेह स्थित कुशोक बकुला रिम्पोछी हवाई अड्डे पर सकुशल लैंड करवाया गया। यह पहला मौका जब एएन-32 के दोनों इंजनों को 10 प्रतिशत मिक्स्ड स्वदेशी बायो जेट फ्यूल से चलाया गया। दिसंबर 2018 में भी यह टेस्ट विमान के एक इंजन के साथ हुआ था। मगर अब यह परीक्षण विमान के दोनों इंजनों के साथ किया गया है।
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बताते चलें कि लेह, दुनिया के सबसे ऊंचे और सबसे कठिन परिचालन वाले हवाई क्षेत्र में से एक है। साफ मौसम के दौरान भी इस हवाई पट्टी पर किसी विमान को उतारना एक बड़ी चुनौती होता है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में जब पूरा इलाका जबरदस्त बर्फ से ढका हुआ है, उसके बावजूद एएन-32 ने बायोजेट इंधन के साथ यहां लैंडिंग कर एक इतिहास रचा है। वायु सेना के एक अधिकारी के अनुसार यह ऑपरेशन एक बड़े खतरे से कम नहीं था।

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यह ऑपरेशन परीक्षण विमान और सिस्टम परीक्षण प्रतिष्ठान, बेंगलुरु से परीक्षण पायलटों और परिचालन स्क्वाड्रनों के पायलटों के एक दल निगरानी में किया गया। इस सफल परीक्षण उड़ान ने जहां एक ओर मेक इन इंडिया को बढ़ावा दिया है, वहीं इससे भारतीय वायुसेना की क्षमता में भी खासा इजाफा हुआ है। इस स्वदेशी ईंधन का उत्पादन करने की तकनीक को 2013 में सीएसआईआर-आईआईपी द्वारा विकसित किया गया था। लेकिन देश में समवर्ती विमानन परीक्षण सुविधाओं की कमी के कारण इसे व्यावसायिक उपयोग के लिए परीक्षण और प्रमाणित नहीं किया जा सका। 
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AN-32 विमान (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
वर्ष 2018 में वायुसेना ने इस परियोजना को प्रायोजित किया और ईंधन परीक्षण की पूरी श्रृंखला के लिए अपने मानव और भौतिक संसाधनों को चैनलबद्ध किया। खासबात यह कि यह ईंधन गैर-खाद्य ई- ट्री बोर्न ऑयल्स ’से उत्पन्न होता है, जो छत्तीसगढ़ राज्य के आदिवासी क्षेत्रों से उगाया और खरीदा जाता है। 
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