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अटल बिहारी वाजपेयी पर प्रीतम सिंह ने की पीएचडी, किताब में किए 5 ऐसे खुलासे...जानता नहीं कोई

Fri, 17 Aug 2018 05:12 PM IST
राजेश शांडिल्य, अमर उजाला, कुरुक्षेत्र(हरियाणा)
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अटल बिहारी वाजपेयी
क्या आप जानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी पर डॉ. प्रीतम सिंह पीएचडी कर चुके हैं और उन्होंने अपनी किताब में उनके जीवन के बारे में कई खुलासे किए थे, शायद ही कोई जानता हो।
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अटल बिहारी वाजपेयी
भारतीय राजनीति में अजातशत्रु कहे जाने वाले जिन अटल जी के सम्मोहित करने वाली भाषण शैली का जमाना मुरीद रहा, वे अपना पहला भाषण स्कूल के वार्षिकोत्सव में मंच पर भूल गए थे। ऐसे कई सुने-अनसुने किस्से अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन पर पीएचडी कर चुके डॉ. प्रीतम सिंह की पुस्तक में मिलते हैं। अपने दादा की पोथियों और पिता की रचनाओं से तुकबंदी की कला सीखने वाले अटल जी के जीवन पर उनकी यह पुस्तक 2014 में प्रकाशित हुई थी।
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अटल बिहारी वाजपेयी
अटल जी के काव्य का शिल्प पक्ष रखते हुए डॉ. प्रीतम सिंह ने अपनी पुस्तक में उनके  परिवार, जन्म, स्कूल-कॉलेज छात्र जीवन, पत्रकार, साहित्यकार, राजनीति, विदेश यात्राओं और काव्य रचनाओं के साथ कई घटनाक्रमों को प्रस्तुत किया है। अमर उजाला से विशेष बातचीत में डॉ. प्रीतम ने बताया कि अटल जी के काव्य का मुख्य रस था राष्ट्रप्रेम था। उनकी अधिकतर रचनाएं वीर रस में रहीं, लेकिन साथ ही इनमें करुणा का भाव भी शुमार था।

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अटल बिहारी वाजपेयी
उनकी रचना में वीर पुत्र, मेरी जननी के जगती में जौहर अपार, अकबर के पुत्रों से पूछो, क्या याद है मीना बाजार, क्या याद है उन्हें चित्तौड़ गढ़ दुर्ग में जलने वाली आग प्रखर, जब हाय, सहस्त्रों, तिल-तिल जल कर हो गई अमर...। डॉ. प्रीतम सिंह के मुताबिक सुकवि वाजपेयी जी के काव्य में मुहावरे और कहावतों का सुंदर प्रयोग है। मेरी इक्यावन कविताएं और कैदी कविराय की कुंडलियां में यह साफ दिखता है।
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अटल बिहारी वाजपेयी
वहीं उनके काव्य में विदेशी शब्दों का सुंदर अलंकरण दिखता है। बेनकाब चेहरे, दाग बड़े गहरे, टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूं... में उर्दू और सैंतालीस में एमरजेंसी क्यों न लगाई, मीसा मंत्र महान, रौलट की संतान... जैसी रचनाओं में अंग्रेजी के शब्दों का कई जगह इस्तेमाल किया है।
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अटल बिहारी वाजपेयी
जगजाहिर है कि अटल जी उच्च कोटि के कवि तथा भारतीय राजनीति में अधिक पसंद किये जाने वाले राजनेता थे, जिन्होंने अपनी ओजस्वी और आकर्षक रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रभक्ति को जागृत करने प्रयास किया। उन्होंने अपने संबोधनों और रचनाओं समसामयिक विषयों को जिस भी शैली में देशवासियों के समक्ष रखा,उस चर्चा और विचार हर दिशा में हुआ। फिर चाहे वह भारत विभाजन हो, 1975 में एमरजेंसी के हालात या आतंकवाद के दौर में स्वर्ण मंदिर में हुई घटनाएं।  

 
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अटल बिहारी वाजपेयी
नवसृजन के कवि अटल जी और हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा
डॉ. प्रीतम के अनुसार अटल जी के काव्य में नव-सृजन के भाव विद्यमान थे। उनका मानना था कि जीवन में चाहे कितने कष्ट और दु:ख आएं, व्यक्ति को निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रत्यनशील रहना चाहिए। ऐसे ही हालात में उनकी बहुचर्चित काव्य रचना है- हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं। 

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अटल बिहारी वाजपेयी
अटल जी पर शोध के लिए पहला रजिस्ट्रेशन 1999 में
डॉ. प्रीतम सिंह वो शख्शियत हैं, जिन्होंने पूरे देश में अटल जी पर शोध करने की पहल की 1999 में थी। देश की किसी भी यूनिवर्सिटी में यह पहला रजिस्ट्रेशन हुआ था, जोकि अटल जी के जीवन पर शोध के लिए हुआ। वर्ष 1999 में कुमाऊं यूनिवर्सिटी नैनीताल में रजिस्ट्रेशन के बाद डॉ. प्रीतम का शोधकार्य 2002 में पूरा हुआ था। इसके पश्चात अटल जी के जन्मदिवस पर डॉ. प्रीतम सिंह की पुस्तक अटल बिहारी बाजपेयी सृजन और मूल्यांकन प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन हरियाणा के मौजूदा राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने 25 दिसंबर 2014 में किया। 

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atal bihari vajpayee
अटल जी का त्रिवेणी व्यक्तित्व
डॉ. प्रीतम सिंह का कहना है कि नवंबर 2014 में उन्होंने इस पुस्तक पर कार्य शुरू किया था, क्योंकि यह वो सख्शियत है, जिनके व्यक्तित्व में गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी का स्वरूप प्रतिबिंबित होता है। उनकी पुस्तक में सुकवि अटल जी के जीवन की झलक उनके जन्म स्थान से वंश परिचय के साथ आगे बढ़ती हुई साहित्य, संवेदना, काव्य के शिल्प पक्ष का अध्ययन कराते हुए समापन की ओर बढ़ती है।

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atal bihari vajpayee
खाने के शौकीन
डॉ. प्रीतम ने अपनी पुस्तक में अटल जी के खाने के शौकीन मिजाज का भी जिक्र किया है। उन्हें बाजरे का पुआ और गुजिया काफी पसंद थी। ग्वालियर का चूड़ा तो उन्हें इतना अच्छा लगता था कि जब भी वे ग्वालियर जाते तो ढेर सारा चूड़ा खरीद लाते थे। खीर, कढ़ी, पनेछा और गलरा के भी अटल जी दीवाने थे। ग्वालियर के एमएलबी रोड पर पीपल के पेड़ के नीचे एक बुढ़िया स्वादिष्ट मुंगौड़े बनाया करती थी, जो अटल जी को खूब पसंद रहे। अटल जी जब भी ग्वालियर जाते, बुढ़िया के मुंगौड़े खाना नहीं भूलते थे। 

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atal bihari vajpayee
अटल जी और उनके पिता दोनों रहे सहपाठी
अटल जी और उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी दोनों ने कानून की पढ़ाई करने के लिए कानपुर के डीएवी कॉलेज में एलएलबी में प्रवेश लिया और एक ही छात्रावास में भी रहे। तब कॉलेज में पिता-पुत्र की यह जोड़ी खूब चर्चा में रही। यहां तक कि जब अटल जी कक्षा में नहीं आते थे तो प्राध्यापक उनके पिता से पूछते- कहां हैं आपके पुत्र।
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Atal Bihari Vajpayee
पहला भाषण भूल गए थे...
अटल बिहारी बाजपेयी की जिस भाषण शैली की दुनिया कायल रही है, वही अटल अपना पहला भाषण में बीच में भूल गए थे। यह वाक्या वड़नगर के उस स्कूल के वार्षिकोत्सव में हुआ, जहां उनके पिता पं. कृष्ण बिहारी बाजपेयी हेडमास्टर थे। बगैर तैयारी किए मंच पर पहुंचे अटल जी लड़खड़ा गए और भाषण बीच में ही बंद करना पड़ा।

 
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