सिप्पी जोशी, बिंदिया भोला
- फोटो : अमर उजाला
इस हादसे को जितना भूलना चाहती हूं, हर तारीख मुझे फिर वही घटना याद करवाती है। जिस कारण रात को सो तक नहीं पाती हूं। उन्हें यह सजा कब मिलेगी, कोई कुछ नहीं कह सकता है। हर कोई सोच सकता है कि एक पीड़िता का जीवन कैसा होगा, अदालत में जाकर बार-बार जलील होना, समाज में भी लोगों की तरह-तरह की बातें सुनना।
इसके बाद आगे की जिंदगी में क्या-क्या सहना पड़ेगा। इसे सोच कर ही डर रही हूं। इससे तो मर जाना ही अच्छा है। सरकार को चाहिए कि अगर वह एक रात में करंसी बंद करने का फैसला ले सकती है, तो दुष्कर्मियों को फांसी के तख्ते पर लटकाने जैसे फैसले में देरी क्यों हो रही है। -इस्सेवाल दुष्कर्म पीड़िता।
जो भी हुआ अच्छा हुआ, ऐसा ही होना चाहिए
शुक्रवार को सुबह जैसे ही हैदराबाद की खबर देखी तो दिल बहुत खुश हुआ है, जो भी हुआ, अच्छा हुआ है। इस खबर में पूरे देश में एक मैसेज दिया है कि महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराध करोगे, तो अब ऐसी सजा मिल सकती है। आज निर्भया केस को सात साल बीत चुके हैं, लेकिन किसी को फांसी की सजा नहीं मिली है। इस मामले में न्यायपालिका में कुछ तेजी लाने की जरूरत है, क्योंकि एक पीड़िता के लिए हर दिन भारी होता है। वह इस समाज में कैसे रहती है, हम सिर्फ अंदाजा लगा सकते है। -मोना लाल, एग्जिक्यूटिव डॉयरेक्टर निफ्ड।