रियो ओलंपिक में चोट लगने के बाद टूट गई थी, एक साल बिस्तर पर रहना पड़ा, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। काफी रोचक है विनेश फोगाट के फिर से गोल्ड मेडलिस्ट बनने की कहानी, पढ़ें।
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vinesh phogat
शरीर नहीं दे रहा था उचित प्रतिक्रिया
रियो ओलंपिक में चोटिल होने के बाद मैट पर वापसी करना, मेरी जिंदगी का सबसे चुनौतीपूर्ण सफर रहा है। इस दौरान मेरी लड़ाई खुद से थी। बाहरी सभी चीजें मेरे अनुकूल थी, बस मेरा शरीर ही उचित प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था। मुझे खुशी है कि मैंने इससे पार पाया। विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक पदक मेरी ख्वाहिशों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर है। मेरा आत्मविश्वास स्वाभाविक है। मैट पर उतरने के बाद मुझे कुश्ती के सिवा दूसरी कोई भी चीज नहीं दिखती है। यहां तक कि कोच के निर्देशों पर भी मेरा कोई ध्यान नहीं होता है। मैं मैट पर हूं और मुझे कुश्ती लड़नी है, उस वक्त मुझे बस यही पता होता है।
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पहलवान विनेश फोगाट
पहली बार कुश्ती के बाद खूब रोई थी
भले ही एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतना राष्ट्रमंडल खेलों की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण है, पर मेरे लिए 2014 का ग्लासगो राष्ट्रमंडल स्वर्ण ज्यादा अहम है। वह ऐसा लम्हा था, जब पहली बार दुनिया ने एक और फोगाट की काबिलियत देखी थी। उस वक्त मैं पांचवीं कक्षा में थी। जब ताऊ जी (महावीर फोगाट) ने मुझसे कहा था कि मैं मैट पर कुश्ती लड़ूंगी। मैं बहुत खुश थी और बेसब्री से पूरा दिन अपनी बारी का इंतजार करती रही। देर शाम हो गई और मुझे लगा कि खेल खत्म होने वाले हैं। मैंने ताऊ जी से अपनी बारी के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि सामने वाली खिलाड़ी तुमसे उम्र में बड़ी है, इसलिए तुम नहीं खेल सकती। पहली बार मैट पर कुश्ती न लड़ पाने के गम में मैं उस दिन खूब रोई थी।
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विनेश फोगाट
शुरू में नहीं पसंद थी कुश्ती
हम सभी बहनों को ताऊ जी ने उस माहौल में कुश्ती सिखाई, जिस समाज में लड़कियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं होती। हमारे समाज में पुरुषों का ही वर्चस्व है। शुरुआत में मुझे कुश्ती बिल्कुल पसंद नहीं थी। मैं बचपन में दूसरे बच्चों की तरह अन्य खेल खेलती थी। मैं भी दूसरी लड़कियों की तरह पढ़ाई-लिखाई करके नौकरी वगैरह के बारे में सोचती थी। लेकिन हमेशा कुश्ती के माहौल में रहने की वजह से धीरे-धीरे मेरा रुझान भी दांव-पेच की तरफ झुकता गया। जब मैं पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर खेली थी, तो मुझे अपने जूतों के फीते बांधने नहीं आते थे। मेरी बहन प्रियंका ने मेरे फीते बांधे थे। शायद नए जूतों से मिली खुशी के उत्साह में ही मैं वहां जीत गई थी। कुश्ती में शुरुआती सफलता के बाद लोगों के प्यार ने मुझे और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। हालांकि कुश्ती से दिल लगाने से पहले मुझे टेनिस से भी लगाव रहा है। उस वक्त सानिया मिर्जा की तस्वीरें मेरी धरोहर में शामिल थीं।
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ओलंपियन पहलवान विनेश फौगाट
बेवजह भी हंसती हूं
सुबह-शाम कड़ी ट्रेनिंग के बाद दिनचर्या में इतना वक्त ही नहीं बचता कि किसी दूसरे काम के बारे में सोचा जा सके। फिर भी खाली वक्त में मैं अपने दोस्तों से फोन पर बातें करना पसंद करती हूं। कभी-कभार ही फिल्में देखने के लिए वक्त निकाल पाती हूं। यहां तक कि मैंने दंगल भी अभी तक पूरी नहीं देखी है। यदि मैं बिना हंसे थोड़ी देर तक वक्त बिता दूं, तो मुझे लगता है कि मुझे कोई तकलीफ है, कोई दुख है, जो मुझे सता रहा है। हंसना मेरी आदतों में शुमार है। इसके लिए मुझे किसी वजह की जरूरत नहीं है। कभी-कभार कोच बेवजह हंसने के लिए मुझे डांटते भी हैं, मगर इतनी प्यारी आदत भला हल्की डांट से कहां जाने वाली है!
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इंटरनेशनल पहलवान विनेश फोगट
- फोटो : अमर उजाला
विनेश फोगाट देश की पहली महिला पहलवान के परिवार से हैं। विनेश का जन्म 25 अगस्त 1994 को हरयाणा के बलाली गांव में हुआ था। नौ साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता को खो दिया था, फिर उनकी देखभाल उनके अंकल महावीर सिंह फोगाट ने की। महावीर सिंह फोगाट पहलवान गीता और बबिता के पिता हैं। 2010 में गीता के कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण के जीत के बाद विनेश ने परिवार की इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कदम उठाए। कोच महावीर फोगाट ने उन्हें कड़ी ट्रेनिंग देनी शुरू की। फिर विनेश ने साल 2013 में एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप और राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप के 51 किलो वर्ग में कांस्य और रजत पदक जीतकर अपना दम दिखाया।
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vinesh phogat
जुलाई 2014 में विनेश फोगाट सबकी नजर में आई। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में 19 वर्षीय विनेश ने अपने पहले ही कामनवेल्थ खेल के महिलाओं के 48 किलो फ्रीस्टाइल कैटेगरी में स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद उन्होंने एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतकर अपने आप को बड़ा पहलवान साबित किया। साल 2016 में एशियाई खेलों में वें 48 किलो वर्ग की होने के बावजूद 53 किलो वर्ग में मुकाबला किया और कांस्य पदक जीता। उलान बाटोर, मंगोलिया में हुए उनके पहले ओलंपिक क्वालीफाइंग मुकाबले में वजन 400 ग्राम ज्यादा होने के कारण डिसक्वालीफाई कर दिया गया।
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- फोटो : फाइल फोटो
भले ही यह विनेश के लिए बड़ा झटका हो, लेकिन इसके कुछ हफ्ते बाद उन्होंने वापसी करते हुए इस्तांबुल क्वालीफायर के जरिये रियो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया। इस दौरान उन्होंने 2014 विश्व चैंपियनशिप की रजत पदक विजेता इवोना मैकोव्स्का को हराकर स्वर्ण पदक जीता। रियो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वे पहली महिला पहलवान थी। 2016 में रियो में चीन की सुनियान के खिलाफ खेलते हुए रियो ओलंपिक 2016 में विनेश चोटिल हो गई थी और करीब एक साल तक बिस्तर पर रही। उस घटना से विनेश को बड़ा धक्का लगा था। उसका पश्चाताप कम नहीं हो पा रहा था। लेकिन महावीर फोगाट और बहनों ने उसे फिर से लड़ने का हौंसला दिया।
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- फोटो : फाइल फोटो
नतीजा आज सभी के सामने है, पहले कॉमनवेल्थ में गोल्ड और अब एशियन गेम्स में गोल्ड। 20 अगस्त 2018 दिन सोमवार को एशियन गेम्स में शुरू हुए पहले राउंड मैच में विनेश ने चीन की सुनियान को 8-2 के अंतर से मात दी और फाइनल में प्रवेश किया। फाइनल में विनेश ने महिलाओं की फ्रीस्टाइल 50 किग्रा वर्ग के खिताबी मुकाबले में जापान की पहलवान यूकी आयरी को से हराकर गोल्ड मेडल जीता। सुनियान को हराने के बाद विनेश की मां प्रेमलता और बहन प्रियंका को वे क्षण याद आ गए, जब 2016 ओलंपिक खेलों में सुनियान के साथ खेलते हुए विनेश चोटिल होकर प्रतियोगिता से ही बाहर हो गई थी।
इससे पहले विनेश ने 21वें कॉमनवेलथ गेम्स में 50 किलोग्राम की कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा था। बता दें कि विनेश फोगाट को एक समय डॉक्टरों ने पहलवानी छोड़ने की सलाह दे दी थी। डॉक्टरों का कहना था कि अगर अब दोबारा चोट लगी तो जान पर बन सकती है। उसके बावजूद विनेश ने हिम्मत नहीं हारी और हर दिन पांच से छह घंटे कड़ा अभ्यास कर जबरदस्त वापसी की। इसके पीछे उसकी बहन गीता फौगाट, बबीता फौगाट, रितू, प्रियंका और संगीता की विशेष भूमिका रही। कर्नाटक के विजय नगर में यह छह बहनें वहां कुश्ती हॉल में रहने लगीं। पांचों बहनों ने मिलकर प्रयास करते हुए चोटिल विनेश को कुश्ती के मैट पर वापसी करवाई।