13 सितंबर को गणेश चतुर्थी है, तो ज्योतिषियों के अनुसार इस दिन भक्तों को दो काम भूलकर भी नहीं करने चाहिए, वरना दरिद्रता झेलनी पड़ सकती हैं। जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा का समय...
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भाद्र पद शुक्ल चतुर्थी तिथि को गणेशोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणेश जी का जन्म हुआ था। पंचदेवताओं में गणेश जी का प्रथम स्थान है। भगवान गणेश की पूजा दोपहर में की जाती है। यह बात सेक्टर-30 के श्री महाकाली मंदिर स्थित भृगु ज्योतिष केंद्र के प्रमुख बीरेंद्र नारायण मिश्र ने बताई। चतुर्थी तिथि को स्वाती नक्षत के साथ रवि योग है। इसके कारण मारूत नामक योग भी बन रहा है।
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मारूत योग 12 सितंबर रात दो बजकर 4 मिनट से प्रारंभ होकर 13 सितंबर को रात एक बजकर सात मिनट तक चलेगा। इसलिए इस वर्ष भगवान गणेश जी जन्मोत्सव मारूत योग में होने के कारण विद्या बुद्धि, सुख शांति और समृद्धि बनी रहेगी। चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 12 सितंबर को दिन बुधवार को शाम चार बजकर सात मिनट पर हो रहा है। यह 13 सितंबर दिन वीरवार को दोपहर बाद 2 बजकर 52 मिनट पर समाप्त हो रहा है।
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बीरेंद्र नारायण मिश्र का कहना है कि भगवान गणेश का जन्म दोपहर में हुआ है, इसलिए इनकी पूजा दोपहर को ही होगी। उन्होंने बताया कि पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:27 से दोपहर बाद 12:27 बजे तक सबसे बेहतर है। उसके बाद भी पूजा की जा सकती है। इसके बाद डेढ़ बजे तक का समय मध्यम है। दो बजकर 52 मिनट पर चतुर्थी की समाप्ति के कारण पूजा नहीं हो सकती।
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देवालय पूजक परिषद के कोषाध्यक्ष और सेक्टर-18 के श्रीराधा कृष्ण मंदिर के पुजारी डा लाल बहादुर दुबे का कहना है कि इस मुहूर्त में पूजा करने का विशेष महत्व है। उन्होंने बताया कि गणेश की पूजा से बुद्धि, विद्या और ऋद्धि सिद्धि की प्राप्ति होती है। सभी विघ्नों का नाश होता है। गणेश जी को द्रूर्वा बहुत ही प्रिय है। उनके अनुसार दूर्वा से गणेशजी का अभिषेक किया जाए तो सभी की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
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राहु काल में पूजा नहीं, चंद्रमा को भी न देखें
वहीं पुजारी जी ने बताया कि वीरवार को राहु काल दोपहर डेढ़ बजे से तीन बजे तक रहेगा। राहु काल में पूजा नहीं करनी चाहिए। पौराणिक मान्यता के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी की रात को चन्द्र-दर्शन नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि अनजाने में यदि कोई व्यक्ति चतुर्थी की रात में चंद्रमा को देख ले तो उसे झूठा-कलंक झेलना पड़ता है। इसीलिए इस दिन चन्द्रदेव को अर्घ्य देना चाहिए लेकिन उनकी ओर देखना नहीं चाहिए।
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गणेश जी की स्थापना में वास्तु का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इनकी मूर्ति को पूर्व-उत्तर दिशा में बैठना शुभ होता है। भूलकर भी दक्षिण पश्चिम कोण पर इनकी स्थापना नहीं करनी चाहिए। पूजा घर पर भगवान गणेश जी की दो या उससे अधिक मूर्तियों को एक साथ नहीं रखना चाहिए। इससे अशुभ माना जाता है, क्योंकि दो मूर्तियों की ऊर्जा आपस में एक साथ टकराने से अशुभ फल मिलता है।
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भगवान गणेश जी की मूर्ति का मुख दरवाजे की तरफ नहीं होना चाहिए। क्योंकि गणेश जी मुख की तरफ समृद्धि, सुख और सौभाग्य होता है। जबकि पीठ वाले हिस्से पर दुख और दरिद्रता का वास होता है। पुराणों के अनुसार, गणेश जी की पीठ के दर्शन करना अशुभ फलदायी होता है। गणेश जी की पीठ पर दरिद्रता का निवास होता है। मान्यता है कि इसके दर्शन करने से व्यक्ति का दुर्भाग्य आता है।
भगवान गणेश जी की मूर्ति को घर पर लाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि गणेश जी की सूंड बाईं तरफ होनी चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इस तरह की मूर्ति की उपासना करने पर जल्द मनोकामना पूरी होती है। पूजा में तुलसी न चढ़ाएं। सफेद फूलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। गणेश जी का पूजन लाल फूल से करना चाहिए। गणेश जी उत्साह और ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं।