अगर आप डायबिटीज के मरीज हैं तो जान लीजिए कि आपको एक गंभीर बीमारी भी हो सकती है, जिसके नुकसान इतने खतरनाक हैं कि आप यकीं नहीं कर पाएंगे।
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डायबटीज
जान लीजिए कि लंबे समय तक डायबिटीज होने से कई मरीजों में चारकोट नामक बीमारी हो जाती है। इससे पैरों की हड्डियां टूटने लगती हैं। डायबिटिक फुट होने के कारण मरीजों को हड्डियों के टूटने का पता नहीं चलता। धीरे-धीरे घाव बनता है। घाव का भी कई बार पता नहीं चलता और मरीज चलते रहते हैं। इससे उनका पैर भी टेढ़ा होता है। कइयों में तो घाव इतना गंभीर बनता है कि मरीजों के पैर काटने तक नौबत पहुंच जाती है।
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डायबिटीज, हेल्थ
- फोटो : फाइल फोटो
ऐसे कई मरीज पीजीआई पहुंच रहे थे, मगर उनके इलाज का कोई ठोस तरीका नहीं मिल रहा था। पीजीआई के एंडोक्रिनोलाजी के डॉ. आशु रस्तोगी ने इसके लिए एक नया प्रयोग किया। जो दवा अस्टियोपोरोसिस के मरीजों को दी जा रही थी, उस दवा का इस्तेमाल इन मरीजों में करने का फैसला लिया गया। ट्रायल हुआ और प्रयोग सफल रहा। एक साल तक मरीजों को दवा दी गई। दवा देने के बाद मरीजों की हड्डियां मजबूत हुईं और हड्डियां का टूटना भी बंद हो गया।
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डायबिटीज, हेल्थ
- फोटो : फाइल फोटो
अब मरीज दोबारा से अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं। इसे अमेरिकन क्लीनिकल ट्रायल में रजिस्टर्ड कराया गया और 24 मरीजों में परीक्षण सफल रहा। आस्टियोपोरोसिस के मरीजों की हड्डियां कमजोर होने पर उन्हें टैरीपैराटाइड का डोज दिया जाता है। इससे मरीजों की हड्डियां मजबूत होती हैं। डॉ. आशु और अन्य सहकर्मियों ने इस दवा का विश्व में पहली बार चारकोट के मरीजों में ट्रायल किया।
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bones
इससे पहले पीजीआई के डाक्टरों ने अपने ट्रायल को अमेरिकन क्लीनिकल ट्रायल में रजिस्टर्ड कराया। उसके बाद 24 मरीजों में टैरीपैराटाइड दवा का डोज रोजाना एक साल तक दिया गया। इस दौरान एक भी बार मरीज की हड्डी नहीं टूटी। उल्टा और मजबूत हो गई। हालांकि, मरीजों के पैर तो सीधे नहीं हो पाए, मगर उन्हें मोडिफाइड जूते मुहैया करवाए गए। जूतों की मदद से वे आसानी अब चल सकते हैं। पीजीआई का दावा है कि इससे पहले टैरीपैराटाइड दवा का इस्तेमाल किसी भी देश में नहीं किया गया।
प्रयोग करने पर डॉ. आशु को मिला नेशनल अवार्ड
इस सफलतम प्रयोग के लिए डा. आशु रस्तोगी को एआर सेठ अवार्ड से नवाजा गया। उन्हें ये अवार्ड त्रिवेंद्रम में आयोजित 47वें एंडोक्राइन सोसाइटी आफ इंडिया की आयोजित नेशनल कांफ्रेंस में दिया गया है। यह एक राष्ट्रीय स्तर का नेशनल अवार्ड है। इसमें देश के भर एंडोक्राइन से जुड़े विशेषज्ञ आते हैं और अपना पेपर पेश करते हैं। पीजीआई में इससे पहले इसी डिपार्टमेंट के डा. संजय बडाडा को पांच साल पहले अवार्ड मिला था।