सिर्फ प्लेटलेट्स का बढ़ जाना ही डेंगू का ठीक होना नहीं है। इसके लिए आपको बेहद जरूरी तीन काम करने होंगे, अगर इग्नोर कर दिए तो जान तक जा सकती है।
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dengue, malaria, chikungunya
बारिश के बाद पानी खड़ा होने से मच्छर पनपते हैं। इसके काटने से डेंगू और चिकुनगुनिया जैसी बीमारी काफी तेजी से फैलती है। वहीं समय पर इलाज न करने से और इसके बारे में सही जानकारी न होने पर मरीज की जान तक जा सकती है। डेंगू होने से शरीर में प्लेटलेट्स की कमी हो जाती है, जिन्हें बढ़ाने की कोशिश की जाती हैं, लेकिन सिर्फ प्लेटलेट्स की कमी पूरी होने से डेंगू की बीमारी दूरी नहीं होगा, इसके लिए कई और सावधानियां भी बरतनी होंगी।
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dengue
डेंगू में सबसे बड़ी समस्या कैपिलरी-लीक की होती है। कैपिलरी, रक्तवाहिनाएं होती हैं, डेंगू होने पर इनमें छेद हो जाते हैं। इन छेदों से खून रिसकर शरीर में जमा होने लगता है। इसके कारण ब्लड प्रेशर गिरने लगता है और हिमैटोक्रिट बढ़ने लगता है। डेंगू के मरीज को तीन जांच जरूर करानी चाहिएं- ब्लडप्रेशर, हिमैटोक्रिट और प्लेटलेट्स काउंट। केवल प्लेटलेट पर ध्यान देना काफी नहीं, डेंगू की शुरुआत होने पर बुखार और बदन दर्द की कोई दवा खुद से न लें।
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dengue
डेंगू होने पर जितना जल्दी हो डॉक्टर से मिलें। जब प्लेटलेट्स की संख्या गिरकर बीस हजार के नीचे हो जाती है, तभी डॉक्टर प्लेटलेट्स चढ़ाने की सलाह देते हैं। लेवल ज्यादा नीचे चले जाने पर प्लेटलेट्स चढ़ाना बेकार है और उसका कोई फायदा नहीं है। इसलिए इलाज कर रहे डॉक्टर की सलाह पर चलना चाहिए। डेंगू के इलाज का अर्थ केवल और केवल प्लेटलेट्स बढ़ाकर जान बचाना नहीं है, जान तभी बचेगी जब मरीज का कैपिलरी-लीक ठीक होगा।
बता दें कि डेंगू की शुरुआत तेज बुखार से होती है, जिसके साथ पूरे शरीर, जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द होता है। जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द की वजह से मरीज़ का चलना फिरना मुश्किल हो जाता है। जिसकी वजह से इसे 'हड्डी तोड़ बुखार' भी कहा जाता है। बुखार में आंखें लाल हो जाती हैं और आंखों से लगातार पानी बहता है। इन सबके साथ मरीज को उल्टी आना, जी घबराना, भूख नहीं लगना तथा नींद नहीं आना जैसे लक्षण भी झेलने पड़ते हैं।