अब लोग सर्दी में भी गर्मी के फलों और सब्जियों का स्वाद ले सकेंगे। वे ताजा भी रहेंगी और उनकी गुणवत्ता भी बरकरार रहेगी, कैसे जानने के लिए खबर पढ़ें।
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अब लोग साल के पूरे 12 महीने कभी भी किसी भी मौसमी फल और सब्जी का लुत्फ उठा सकेंगे। बस उसे खाने से दो घंटे पहले बंद पैकेट से बाहर निकालना होगा। इस दो घंटे के दौरान वह बिल्कुल ताजा और अपने वास्तविक रूप में आ जाएगा। और बे-मौसम फलों व सब्जियों का स्वाद मिलना संभव हो पाया है चंडीगढ़ स्थित सेंट्रल साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स ऑर्गेनाइजेशन के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए गए खास सिस्टम के जरिए।
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इस सिस्टम की मदद से फलों और सब्जियों को दो साल तक सुरक्षित और वास्तविक स्वाद के अनुसार संरक्षित किया जा सकेगा। इतना ही नहीं हर साल मौसम की मार और अन्य कारणों से बर्बाद होने वाली फल और सब्जियों की फसल को भी सुरक्षित किया जा सकेगा। ऑर्गेनाइजेशन की प्रेसीजन मैकेनिकल सिस्टम (परिशुद्धता) यूनिट द्वारा तैयार किए गए उपकरण का नाम लाइफोलाइजर है, जो मौसमी फलों और सब्जियों को दूसरे मौसम में भी ताजा रखेगा।
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सीएसआईओ के डायरेक्टर प्रो. आरके सिन्हा की देखरेख में वैज्ञानिकों ने ये सिस्टम तैयार किया है। टीम के सीनियर वैज्ञानिक डॉ. हैरी गर्ग ने बताया कि फलों और सब्जियों को उनकी नमी के कारण ज्यादा दिनों तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। इसलिए लाइफोलाइजर बनाते समय नमी को दूर करने पर विशेष ध्यान रखा गया। लाइफोलाइजेशन सिस्टम से फलों और सब्जियों से नमी हटाने में 95 प्रतिशत तक सफलता मिली है।
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नमी हटाने के बाद उसे वैक्यूम सील किया जाता है। इस प्रक्रिया से उसकी ताजगी और स्वाद को लगभग दो साल तक बरकरार रखा जा सकता है। इस मशीन से सुरक्षित रखे गए फलों-सब्जियों को डिमांड के अनुसार संबंधित स्थान पर पहुंचाया जा सकता है। खाने से दो घंटे पहले चीज को पैकेट से बाहर निकालना होगा। जिससे वे वातावरण से नमी प्राप्त करके पुन: अपने वास्तविक रूप में आ सकेंगे। लेकिन ऐसा होने से फल-सब्जी का स्वाद नहीं बदलेगा।
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डॉ. हैरी ने बताया कि लाइफोलाइजर का इस्तेमाल करते समय अलग-अलग फलों-सब्जियों के लिए अलग-अलग समय सीमा तय करनी होगी। अब तक भारत में ऐसी कोई तकनीक नहीं है, जिससे रसीले फलों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके। विदेशों में जिन मशीनों का इस्तेमाल होता है, उनकी कीमत तीन-चार करोड़ है, जबकि सीएसआईओ द्वारा तैयार किए गए इस सिस्टम की कीमत काफी कम है।
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2018 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट को 2019 अक्टूबर में पूरा किया गया है। पहले चरण में 25 किलो क्षमता का सिस्टम तैयार किया गया था, लेकिन अब 100 किलो क्षमता वाला सिस्टम बनाया है। इस रिसर्च पर इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसर्च टेक्नोलॉजी ने मुहर लगा दी है।
उपकरण को बहुत कम कीमत पर बाजार में उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। जिससे फल और सब्जी की खेती करने वाले किसानों को व्यापक स्तर पर लाभ मिले, क्योंकि हर साल करोड़ों रुपये की फसल संरक्षण के अभाव में बर्बाद होती जा रही है। - एसएस सैनी, बिजनेस हेड, सीएसआईओ