छत्तीसगढ़ के सुकमा में CRPF जवानों की शहादत ने सब की आंखों को नम कर गया, लेकिन इस शहादत को एक शख्स कभी भूला नहीं पायेगा। उसके आंसूओं ने दर्द को बयां कर दिया।
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डॉक्टर विक्रम सिंह। सठियाला गांव के इकलौते शख्स हैं, जिनके साथ शहीद रघुबीर सिंह की दांत काटी रोटी थी। दोनों जिगरी यार थे। साथ-साथ पढ़े और जवान हुए। रघुबीर सिंह सीआरपीएफ में भर्ती हो गए और विक्रम सिंह डॉक्टर बन गए। दोनों के बीच फोन पर बातचीत अक्सर होती रहती थी।
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महीने पहले दोनों मिले थे और दोनों ने फ्यूचर प्लानिंग के लिए कई बातों पर चर्चा भी की थी। डॉक्टर विक्रम सिंह की आंखें अपने जिगरी दोस्त के लिए बरस रही थी लेकिन फख्र इस बात का था कि वह शहीद रघुबीर सिंह के दोस्त हैं। कहते हैं कि रघु जैसा यार मिलना मुश्किल है, मेरा दिल अभी भी गवाही नहीं दे रहा है कि मेरा यार अब दुनिया में नहीं रहा और उसने देश के लिए शहादत दे दी।
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रघु को मैं कभी भूल नहीं सकता। उसकी हर बात जैसे कानों में गूंज रही हो। ऐसा लगता है कि वो अभी आकर कहेगा ‘चल वीरें आपां चलिए खेता नूं, उत्ते जिंदगी दीया दो-चार गल्लां करांगे’।
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अमृतसर के गांव सठियाला में शहीद रघुबीर सिंह की शहादत पर हर आंखें सजल थी तो हर सीना गर्व से ऊंचा। अब तक यह गांव केवल सठियाला था अब इस गांव को लोग शहीद रघुबीर सिंह सठियाला के नाम से जानेंगे। रघुबीर सिंह सठियाला को गांव में रघु कहते थे।
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रघु के साथ स्कूल व कालेज की पढ़ाई पूरी करने वाले डाक्टर विक्रम सिंह कहते हैं कि वह बचपन से ही मेहनती थे। स्पोर्ट्स कोटे में वह सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। जब भी छुट्टी मिलती गांव आकर वह इंसपेक्टर रघुबीर सिंह रघु बन जाते।
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उन्होंने बताया रघु बचपन से ही एथलीट में अव्वल आता रहे हैं। गांव के ग्राउंड में वह जून-जुलाई की दोपहर में दौड़ लगाते देख गांव वाले जब उसे समझाते कि धूप अधिक है तो वह हंसते हुए कहते कि मैं देश की रक्षा के लिए अपने शरीर को लोहा बना रहा हूं, ताकि दुश्मनों के साथ लोहा लेे सकूं।
उसकी इच्छा थी कि गांव में वह स्टेडियम बनाएं। आज रघुबीर देश के लिए शहीद हुआ है, मैं चाहता हूं कि सरकार उसके नाम से गांव में स्टेडियम बनाए। रघुबीर की इच्छा थी कि नशामुक्त समाज हो और देश के लिए गांव और आसपास इलाकों से जांबाज जवान तराशे जा सके।