चंडीगढ़ के चार चेहरों से बॉलीवुड का एक राज जुड़ा है। ये चेहरे एक्टर्स के
वो हमशक्ल पैदा करते हैं, जिनकी मौत निश्चित होती है। जानिए सच।
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देखिए, एक्टर्स के ऐसे 'हमशक्ल' जो बनते हैं मरने के लिए
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ये हमशक्त हैं अभिनेताओं के बुत। इन बुतों को तैयार करते हैं चंडीगढ़ के चार चेहरे। उनके नाम हैं- गुरप्रीत सिंह धूरी, हरप्रीत सिंह, राकेश कुमार व आकाश गौड़। टीम के लीडर गुरप्रीत बताते हैं कि अब तक दर्जनों फिल्मों में उनके द्वारा बनाए बुतों का इस्तेमाल हुआ है।
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बॉलीवुड में जोखिम भरे दृश्यों को फिल्माने के लिए सजीव दिखने वाले बुतों के इस्तेमाल की बात हो या फिर किसी म्यूजियम की शोभा बढ़ाने के लिए स्कल्पचर तैयार करने का मामला, ये सब चंडीगढ़ के आर्ट कालेज से निकले प्रतिभावान युवा कलाकारों के बाएं हाथ का खेल है।
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हारर फिल्मों के भूत जो आपको डराते हैं इन्हीं कलाकारों द्वारा उनका मास्क तैयार किया जाता है। उनके इस हुनर को भारतीय फिल्म जगत में काफी तवज्जो मिल रही है।
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फिल्म के ऐसे दृश्य जिसमें किसी व्यक्ति इमारत से नीचे फेंकने, हत्या करने या किसी जानवर के साथ अभिनेता की लड़ाई या फिर कटे हुए हाथ और सिर वाले दृश्य फिल्माने में इस्तेमाल हो रहा है। इन कलाकारों की चार सदस्यीय टीम दिल्ली में काम कर रही है। टीम में शामिल हैं।
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टीम का मानना है कि बुतों को आकार देना आसान नहीं है, इनका निर्माण सिलिकॉन और मोम से किया जाता है। एक बुत को तैयार करने में उन्हें 20-25 दिन लगते हैं। सिलिकॉन, मोम, रबर, मेटल, पर वह काम करते हैं, जिसके जरिए वे किसी व्यक्ति जानवर या वस्तु की हुबहु आकृति तैयार कर रहे हैं।
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गैंग्स ऑफ वासेपुर, फैंडिंग फैनी, बदलापुर, दिल धड़कने दो, राज थ्री, ब्योमकेश बख्शी, डर एट द मॉल, कुछ कु छ लोचा है, जल परी, दक्षिण भारतीय फिल्म डांसिंग डेथ जैसे फिल्मों में काम कर चुके हैं। वहीं इन कलाकारों की आने वाली फिल्म तुंम्बाड है। इस फिल्म में इन कलाकारों का सबसे ज्यादा काम है।
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आजकल ये कलाकार शाहरुख खान का बुत बनाने में जुटे हैं। गुरप्रीत ने बताया कि यह बुत मोम से तैयार किया जा रहा है। इन कलाकारों का दावा है कि इंग्लैंड के मैडम तुसाड से भी ज्यादा सजीव यह बुत दिखेगा। कुछ समय पहले तक यह तकनीक हॉलीवुड तक ही सीमित थी, लेकिन इन युवा कलाकारों ने इस तकनीक को भारत में एक नई पहचान दी।
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टीम का कहना है कि सिलिकॉन का पुतला महंगा बनता है। यह नौ लाख रुपये से शुरू होता है। बाकी डिमांड के हिसाब से कीमत तय होती है। वहीं मोम का पुतला इससे कुछ सस्ता होता है लेकिन इसका रखरखाव सिलिकॉन के पुतले से ज्यादा करना पड़ता है।