‘पीके’ के तपस्वी महाराज अचानक अंधेरी रात में खाली सड़क पर ऐसे अंदाज में दिखे कि सब देखते ही रह गए और फिर क्या हुआ देखिए तस्वीरों में...
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चंडीगढ़ में सौरभ शुक्ला
कल्लू मामा, तपस्वी महाराज कहते हुए लोगों ने उन्हें घेर लिया और फोटो क्लिक करवाने लगे। समझ ही गए होंगे, हम किसकी बात कर रहे हैं। जी हां, ये हैं बॉलीवुड एक्टर सौरभ शुक्ला, जिन्होंने अपने कई रंग बॉलीवुड को दिए हैं। इनमें कभी वह ‘सत्या’ के कल्लू मामा बने, ‘जॉली एलएलबी’ के मजेदार और सेंसिटिव जज तो कभी ‘पीके’ के तपस्वी महाराज। उनके हर किरदार में हल्का मजाकिया अंदाज झलकता है, पर सौरभ शुक्ला कामेडी को मजाक नहीं समझते।
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चंडीगढ़ में सौरभ शुक्ला
सौरभ शुक्ला की कामेडी में गंभीरता है। उसका प्रभाव ऑडियंस पर तब होता है जब उनकी कामेडी पूरी हो जाती है। सौरभ शुक्ला कहते हैं कि पीके में स्वामी जी का किरदार उनके लिए एक चैलेंजिंग किरदार था। वह किरदार उनके एकदम विपरीत था। वह आडंबर पसंद नहीं करते हैं और किरदार में वही सबकुछ था। ऐसे में काफी मेहनत के बाद वह किरदार किया। सौरभ शुक्ला ने कहा कि उनकी नई फिल्म रेड से उनको काफी उम्मीद हैं।
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चंडीगढ़ में सौरभ शुक्ला
नेशनल अवार्ड विजेता गोरखपुर के सौरभ शुक्ला सोमवार को सुधीर मिश्रा की लिखी और निर्देशित फिल्म दास देव के लिए चंडीगढ़ में थे। उनके साथ फिल्म के नायक राहुल भट्ट भी थे। इस मौके पर सौरभ शुक्ला ने कहा कि पहले की तुलना में सिनेमा बहुत बदल चुका है। वर्ष 1960-70 और उसके बाद 1980 से 1990 के दशक की मध्य की फिल्मों में कई बड़े बदलाव आए। 95 के बाद से एक तरह का बदलाव शुरू हो गया। यही बदलाव अब बहुत साफ हो गया है।
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चंडीगढ़ में सौरभ शुक्ला
1993 में जब वह मुंबई आए तो किसी प्रोड्यूसर को कहानी सुनाते थे तो वह पूछता था कि यह किस फिल्म पर आधारित है। यदि वह कहते कि यह ओरिजनल है तो सामने वाला कहता तो फिर मैं क्यों बनाऊं। चले न चले, क्या गारंटी। आपके पास माल पूरा नहीं है। आप ऐसी कहानी लेकर आओ, जो पहले से हिट हो। अब स्थिति बदल रही है। अब प्रोड्यूसर्स कहते हैं कि भाई कुछ नया हो तो बताओ।
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चंडीगढ़ में सौरभ शुक्ला
मूवी रिलीज करना भी मुश्किल
फिल्म बनाना पहले जितना मुश्किल था, अभी भी उतना मुश्किल है। बस, पहले की तुलना में बिजनेस ज्यादा है। अब चीजें मुश्किल हो गई हैं, क्योंकि जमाना महंगा हो गया है। पहले फिल्म रिलीज करने में एक-डेढ़ करोड़ लगते थे, अब 12 से 13 करोड़ रुपये लगते हैं। पिक्चर चाहे आप एक करोड़ में बना लें पर रिलीज तक वह 13 करोड़ की हो जाएगी। हां, अब यह जरूर है कि अब नई तरीके की फिल्में देखने को मिल रही हैं।
जब फिट होंगे तो मिलेगा रोल
अनुराग बासू के साथ मैंने ‘बर्फी’ की। फिर ‘जग्गा जासूस’ की शूटिंग पूरी की। मुझे उस पर भरोसा है। यह भरोसा तब आता है, जब आप उस शख्सियत से प्रभावित होते हैं। उसका काम पसंद करते हैं। वह आपका काम पसंद करता है तो कनेक्शन बनता है। कॉमर्स में कंपनी की जो परिभाषा है वही फिल्म की होती है। उन्होंने कहा कि यदि फिल्म में कोई कैरक्टर है, जिसके लिए मैं फिट हूं तो अनुराग या कोई अन्य मुझे ऑफर करेंगे। दोस्ती की वजह से कोई फिल्म नहीं दे सकता, क्योंकि फिल्म में आपको बहुत कॉन्ट्रिब्यूट करना होता है।