105 डिग्री बुखार से तप रहा था स्वर्ण सिंह, फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी और गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। इस होनहार के चैम्पियन बनने की कहानी भी काफी फिल्मी है, पढ़िए।
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स्वर्ण सिंह
18वें एशियन गेम्स 2018 में शुक्रवार का दिन भारतीय रोवर्स के नाम रहा। इसमें पंजाब के तीन युवाओं ने शानदार प्रदर्शन कर देश के लिए दो मेडल जीते। इनमें स्वर्ण सिंह और सुखमन ने गोल्ड मेडल जबकि भगवान सिंह ने ब्रांज मेडल जीतकर देश के साथ पंजाब का नाम भी रोशन कर दिया। स्वर्ण सिंह और सुखमन पंजाब के मानसा जिले के रहने वाले हैं, जबकि भगवान सिंह मोगा (पंजाब) के निवासी हैं और फिलहाल रोपड़ में रह रहे हैं।
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स्वर्ण सिंह
इन तीनों खिलाड़ियों का चंडीगढ़ से भी अटूट रिश्ता है। मौजूदा समय में तीनों सेना के रोवर्स हैं और पुणे में तैनात हैं। स्वर्ण सिंह सेना में सूबेदार हैं जबकि भगवान सिंह और सुखमन सिपाही की पोस्ट पर हैं। एशियन गेम्स का आयोजन इन दिनों इंडोनेशिया के जकार्ता में किया जा रहा है। रोइंग इवेंट में कई देशों की बेहतरीन टीमें शिरकत कर रही हैं। अमर उजाला ने मेडल जीतने वाले तीनों खिलाड़ियों से खास बातचीत की।
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स्वर्ण सिंह
स्वर्ण सिंह ने बताया कि एशियन गेम्स शुरू होने से पहले मुझे टाइफाइड हो गया था। उस समय मैंने रोइंग को अलविदा कहने का मन बना लिया था, लेकिन रोइंग एसोसिएशन के अधिकारियों ने मुझे समझाया कि ऐसा मत करो, तुम पर हमें भरोसा है। बस अभ्यास करते रहो। अधिकारियों की इसी बात ने मेरे हौसले को और बढ़ा दिया। बीमार होने के बावजूद एशियन गेम्स से दो महीने पहले मैंने अभ्यास शुरू कर दिया और इसका नतीजा सबके सामने है।
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स्वर्ण सिंह
स्वर्ण सिंह ने बताया कि भगवान ने मेरा साथ दिया। मेरी मेहनत रंग लाई और देश के लिए स्वर्ण पदक जीत लिया। जकार्ता से स्वर्ण सिंह ने फोन पर बातचीत के दौरान बताया कि परिवार वाले और दोस्त हमेशा यही कहा करते थे कि स्वर्ण सिंह तेरा नाम है। ऐसे में तुमको इस बार स्वर्ण पदक ही जीतकर लौटना है। इस बार मैंने अपना वादा पूरा किया और देश के लिए स्वर्ण जीत लिया।
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स्वर्ण सिंह
स्वर्ण सिंह ने बताया कि वह चंडीगढ़ स्थित सुखना लेक में चंडीगढ़ और पंजाब के रोइंग सेंटर में आते-जाते रहते हैं और यहां पर नए युवाओं को खेलने के टिप्स भी देते रहते हैं, जिससे वह आगे चलकर सफल रोवर बन सकें। स्वर्ण सिंह मानसा जिले के छोटे से गांव दलेलवाला के हैं। वह वर्ष 2008 में सेना में भर्ती हुए। तब तक वह नौकायन के बारे में नहीं जानते थे।
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स्वर्ण सिंह
नौकायन के प्रति स्वर्ण सिंह में रुचि कैसे व क्यों जगी। इस बारे में वह विभिन्न समय पर दिए साक्षात्कार में कई बार जिक्र कर चुके हैं। स्वर्ण सिंह विर्क ने इससे पहले 2009 में खेल में शुरुआत करके चीन, साउथ कोरिया में मुकाबले जीतकर मेडल जीते। उसका भाई लखविंदर सिंह पुलिस में नौकरी करते रहे है। पिता गुरमुख सिंह मामूली जमीन की खेती करते हैं, जबकि माता सुरजीत कौर घरेलू महिला हैं।
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स्वर्ण सिंह
स्वर्ण सिंह कहते हैं कि मैं सेना में पैसों के लिए भर्ती हुआ था। वर्ष 2009 में रांची में सिख रेजीमेंट में तैनात था। गणतंत्र दिवस के परेड की तैयारी कर रहा था। एक दिन एक अधिकारी मेरे पास आए और कहा, नौकायन टीम में शामिल होंगे। मैं अवाक सा उनको देखने लगा। नौकायन क्या है, यह मुझे पता ही नहीं था। फिर भी अधिकारी ने कहा था तो मैं मना नहीं कर सका। मुझे सिर्फ मेरी लंबाई के कारण चुना गया।
खुशकिस्मती से मैं सैन्य अधिकारियों की उम्मीदों पर खरा उतरता था। मुझे टीम में रख लिया गया और ट्रेनिंग शिविर में भाग लेने के लिए पुणे भेजा गया। मुझे पता था कि अगर इस खेल में भाग लिया और जीता तो मुझे प्रमोशन मिलेगा। प्रमोशन की चाह में नौकायन मुकाबले में भाग लेने लगा। इसके बाद मैंने मुड़कर कभी नहीं देखा। विभिन्न राष्ट्रीय मुकाबलों के अलावा ओलंपिक व एशियन गेम्स में भाग लेकर ऊंचा मुकाम पाया है।