फेरी लगाकर सड़कों पर कुल्फी बेचने वाला युवक आज बड़ा अफसर बन गया है। अब पुलिस उसे सेल्यूट मारेगी। पढ़िए युवक की सफलता की कहानी।
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Jitender Haryana
- फोटो : अमर उजाला
बात हो रही है, हरियाणा में सिरसा जिले के डबवाली निवासी जितेंद्र की। वे डबवाली से पहले एचसीएस हैं। उनके पिता रिक्शा चलाते थे। पिता की मौत के बाद मां ने लोगों के घरों में चूल्हा-चौका किया। मां के बीमार होने के बाद बोझ बड़े भाई के कंधों पर आया तो उन्होंने दुकानों में काम करके जितेंद्र को पढ़ाया। इस प्रकार तमाम मुश्किलों से पार पाते हुए जितेंद्र ने अपनी मेहनत और लगने से मिसाल कायम कर दी है।
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शुक्रवार को इंटरव्यू समाप्त होने के बाद जैसे ही परिणाम जारी हुआ नरवाना में बतौर रोजगार सहायक तैनात जितेंद्र चयनितों की सूची में अपना नाम देखकर खुशी से उछल पड़े। उन्होंने अपने बड़े भाई जेबीटी बलजिंद्र रीत तथा मां भतेरी देवी को फोन करके जानकारी दी तो परिवार में भी खुशी का माहौल हो गया। जितेंद्र शनिवार को डबवाली में अपने घर पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत किया।
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जितेंद्र के अनुसार उनकी प्रारंभिक शिक्षा डबवाली की राजकीय प्राथमिक पाठशाला नंबर तीन में हुई है। औढां स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय में बारहवीं पास की। इसके बाद पंजाब यूनिवसिर्टी चंडीगढ़ से बीए प्राइवेट किया। औढ़ां से 1998 में जेबीटी पास की। करनाल तथा सिरसा में पोस्टिंग मिली, लेकिन मंजिल कुछ और ही थी। अवैतनिक अवकाश लेकर दिल्ली में आईएएस की कोचिंग शुरू की।
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जितेंद्र पहली बार वर्ष 2000 में आईएएस की परीक्षा में बैठा। लगातार नौ साल तक परीक्षा दी। वर्ष 2009 में एचसीएस तथा आईएएस की प्री परीक्षा पास की। मेन चुनने का समय आया तो आईएएस (मेन) चुना, लेकिन पार नहीं पड़ी। वर्ष 2011 में एचसीएस (एलाइड) के तौर पर सहायक रोजगार अधिकारी बना और वर्ष 2013 में नरवाना में नौकरी मिली।
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जितेंद्र के एचसीएस बनने का रास्ता इतना आसान नहीं था। अनपढ़ पिता प्रेमी हरिचंद रिक्शा चलाते थे। 1988 में उनकी मौत के बाद जितेंद्र सहित चारों बच्चों को मां भतेरी देवी ने संभाला। लोगों के घरों में चूल्हा-चौका करके बच्चों को पढ़ाया। 5वीं में पढ़ते हुए गर्मियों की छुट्टियों में बड़े भाई के साथ फेरी लगाकर कुल्फियां तक बेची। यहीं नहीं अपनी पढ़ाई का खर्च स्वयं उठाने के लिए किताबों की दुकान पर नौकरी तक की।
जितेंद्र कुमार के अनुसार उनकी कामयाबी में सबसे बड़ा रोल बड़े भाई बलजिंद्र रीत का है। वे रामलीला में राम का रोल करते रहे हैं और असल जिंदगी में उन्होंने अपने भाइयों के लिए राम का ही किरदार निभाया। दुकानों पर काम करके भाई को पढ़ाया। बीए का फार्म भरने के लिए पैसे नहीं थे तो दुकान पर कार्यरत 250 रुपये भी रीत ने बड़ी मुश्किल से जुटाए, लेकिन अपने छोटे भाई के चेहरे पर शिकन तक नहीं आने दी। जेबीटी लगने के बाद अपनी तनख्वाह भी भाई की पढ़ाई पर लगा दी।