चल फिर नहीं सकती, पर जज्बा वीरांगना वाला। व्हील चेयर पर शहीद पति को नमन करने आई 93 साल की रसूलन तो सभी देखते रह गए, आप भी देखिए।
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अमृतसर पहुंची रसूलन बीबी
1965 की जंग में पाकिस्तान के अमेरिकन पैटन टैंकों को धूल चटाने वाले शहीद वीर अब्दुल हमीद की 93 वर्षीय पत्नी रसूलन आसल उताड़ में उनकी की कब्र पर चादर चढ़ाने के लिए रविवार को अमृतसर पहुंचीं। कहती हैं कि अब शायद सांसें साथ न दें, इसलिए आखिरी बार चादर चढ़ा कर उनको सजदा करने आई हैं। उन्होंने अपने शहीद पति की मजार पर सेना और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में चादर चढ़ाई।
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अमृतसर पहुंची रसूलन बीबी
पंजाब के अमृतसर में खेमकरण स्थित शहीदी स्थल आसल उताड़ में पूर्व सैनिक कल्याण समिति तथा भारतीय सेना की तरफ से रखे समागम में शहीद शौहर को नमन करते वक्त रसूलन खूब रोईं। आंसू थमे तो उन्होंने देश के युवाओं को शहीदों की कुर्बानी की शपथ दिलाई और सेना में पहल के आधार पर भर्ती होने की बात कही। उनका कहना है कि जिंदगी और मौत सिर्फ एक बार मिलती है, इसलिए इसे देश के नाम करें।
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अमृतसर पहुंची रसूलन बीबी
उम्र के आखिरी पड़ाव से गुजर रही रसूलन की आखिरी ख्वाहिश थी कि एक बार चादर चढ़ा जाएं। जब वह मजार पर चादर चढ़ा रही थीं तो एकाएक पति के साथ बिताए दिन याद आ गए, कितने हंसमुख और हिम्मती थे...। एकाएक आंखों से आंसू आंसू छलक आए और वह फफक-फफक कर रो पड़ीं। शायद यह आखिरी दर्शन है। खैर, संभलीं तो भारतीय सेना और शहीदों की बहादुरी से गौरवान्वित हुईं।
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अमृतसर पहुंची रसूलन बीबी
रसूलन ने कहा कि शहीदों ने वतन के लिए कुर्बानी दी और पाक जैसे पड़ोसी देश से लोहा लेते हुए रोज शहादत का जाम पी रहे हैं। शहादत और कुर्बानियों का सिलसिला थमना नहीं चाहिए। युवाओं को सेना में आकर देश सेवा करनी चाहिए, क्योंकि यह उनकी मिल्कियत है जिसे शहीदों ने उनके ही हवाले किया है। वह कहती हैं कि कल हम रहें न रहें, लेकिन हमारा अहले वतन आबाद रहना चाहिए।
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अमृतसर पहुंची रसूलन बीबी
अमृतसर रेलवे स्टेशन पर उतरते ही बीबी रसूलन ने कहा कि अब बातों से काम नहीं चलने वाला, पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना होगा। हावड़ा-अमृतसर एक्सप्रेस ट्रेन से पोते जमील आलम के साथ पहुंची बीबी रसूलन के स्वागत के लिए 15 इंफेंट्री डिवीजन के अधिकारी-जवान, गांव आसल उताड़ के लोग और हिमाचल से पूर्व सैनिक कल्याण समिति के सूबेदार प्रकाश चंद अपने साथियों के साथ पहुंचे हुए थे।
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अमृतसर पहुंची रसूलन बीबी
ट्रेन लेट होने तथा बारिश के बावजूद लोग वहां जमे रहे। ट्रेन के आते ही उनको जवानों ने हाथों-हाथ लिया और व्हील चेयर के जरिए बाहर लेकर आए। रसूलन पढ़ी लिखी नहीं हैं और सुनाई भी कम देता है लेकिन फिर भी वह टूटी-फूटी भोजपुरी में कहती हैं, "हमार अंतिम इच्छा पूरी होवै जात बा। वोकरा के वही के भाषा में जवाब देवै के परी, खाली बाति अउर धमकी से काम न चली।
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अमृतसर पहुंची रसूलन बीबी
उत्तर प्रदेश के जिले गाजीपुर के गांव धरमपुर में मुस्लिम दर्जी परिवार में पैदा हुए हमीद 1954 में ग्रेनेडियर्स इन्फैन्ट्री रेजिमेंट में शामिल हुए थे। जम्मू कश्मीर में बहादुरी दिखाने के चलते उनको पदोन्नत करके लांस नायक बना दिया गया। 1962 में चीन के साथ हुई जंग में भी उन्होंने अपना पराक्रम दिखाया। इसके बाद जब 1965 में उन्होंने खेमकरण सेक्टर के आसल उताड़ इलाके में पाक सेना को टैंकों के साथ आगे बढ़ते देखा।
अपने प्राणों की चिंता न करते हुए अब्दुल हमीद ने अपनी तोप युक्त जीप को टीले के समीप खड़ा किया और गोले बरसाते हुए शत्रु के तीन टैंक ध्वस्त कर डाले। चौथी टैंक पर निशाना लगाते हुए 10 सितंबर को वह दुश्मन की गोलाबारी में शहीद हो गए। मरणोपरांत उनको महावीर और सबसे बड़े सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त भी उनको समर सेवा पदक, सैन्य सेवा पदक और रक्षा पदक प्रदान किये गए।