पाकिस्तान स्थित ऐतिहासिक करतारपुर साहिब के दर्शन करना चाहते हैं तो ये तस्वीरें देखिए, आप निहाल हो जाएंगे। गुरुद्वारे के अंदर का नजारा पहली बार देखने को मिला है।
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करतारपुर साहिब के अंदर का नजारा
- फोटो : अमर उजाला
9 नवंबर 2019 को वो ऐतिहासिक लम्हा आ ही गया, जब सिख संगत ने पाकिस्तान जाकर श्री करतारपुर साहिब के दर्शन किए। 72 साल से देश भर के लाखों सिख श्रद्धालु जिस गुरुघर के दर्शन दूरबीन से किया करते थे, आज वह उसकी ड्योढ़ी पर थे। माथा टेक रहे थे। करतारपुर की पवित्र माटी को चूम रहे थे। अरदास कर रहे थे। खुशी के आंसुओं से आंखें भरी हुई थीं। लबों पर सतनाम वाहे गुरु के जयघोष थे। अब बाबे नानक का दर इतना करीब हो गया है कि कोई भी सिख श्रद्धालु वहां जाकर दर्शन दीदार कर सकता है। अरदास कर सकता है। वह भी बिना वीजा के।
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करतारपुर साहिब के अंदर का नजारा
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इसके लिए भारत और पाकिस्तान ने एक समझौते के तहत करतारपुर कॉरिडोर का निर्माण किया। इस कॉरिडोर के जरिए पाकिस्तान के कस्बे करतारपुर को पंजाब के गुरुदासपुर जिले में स्थित डेरा बाबा नानक के साथ जोड़ा गया है। भारत से लगी सीमा से करीब चार किलोमीटर दूर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के किनारे स्थित श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारा सिखों का पवित्र तीर्थ स्थल है। यह लाहौर से 120 किमी दूर स्थित है। गुरु नानक जी के माता-पिता का देहांत भी यहीं पर हुआ था। यहां बाबा नानक ने अपनी जिंदगी का अंतिम समय बिताया था। यहां उन्होंने 17 वर्ष 5 माह 9 दिन अपने हाथों से खेती तक की।
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करतारपुर साहिब के अंदर का नजारा
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दूसरी ओर, भारत में रावी नदी के किनारे श्री गुरु नानक देव जी का याद में बनाया गया डेरा बाबा नानक स्थित है। यह भारत-पाकिस्तान बॉर्डर से लगभग एक किलोमीटर दूर है। यह पंजाब के गुरदासपुर जिले में आता है। माना जाता है कि बाबा नानक यहां 12 साल तक रहे। मक्का जाने पर उनको दिए गए कपड़े यहां संरक्षित हैं। माघी के अवसर पर जनवरी के दूसरे सप्ताह में यहां भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। गुरु नानक देव जी ने 1506 में अपनी पहली उदासी के बाद इस जगह को ध्यान लगाने के लिए चुना था। जहां वह ध्यान लगाने बैठे थे, वहां एक कुआं था जिसे अजीता रंधावा दा खू (कुआं) के नाम से जाना जाता था।
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करतारपुर साहिब के अंदर का नजारा
- फोटो : अमर उजाला
श्री गुरु नानक देव जी ने ही करतारपुर साहिब की स्थापना की थी और अपनी सभी उदासियों के बाद गुरु नानक देव जी करतारपुर में ही रहने लगे थे, जहां आज गुरुद्वारा करतारपुर साहिब मौजूद है। आस्था और इतिहास, दोनों के लिहाज से करतारपुर बहुत अहमियत रखता है। जब भारत का बंटवारा हुआ, तो पाकिस्तान की तरफ रहने वाले लाखों सिख भारत आ गए। उसके बाद श्री करतारपुर साहिब का स्थल बंटवारे के बाद कई सालों तक उजाड़ रहा, मगर उस दौर में भी बाबा नानक के कुछ मुसलमान भक्त वक्त-वक्त पर यहां दर्शन के लिए आते रहे। करतारपुर गुरुद्वारा में बाबा नानक की समाधि और कब्र आज भी मौजूद है।
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करतारपुर साहिब के अंदर का नजारा
- फोटो : अमर उजाला
कब्र बाहर आंगन में है, और समाधि इमारत के अंदर। आज भी मुसलमान श्री गुरु नानक की दर पर आते हैं। सिखों के लिए बाबा नानक जहां उनके गुरु हैं, वहीं मुसलमानों के लिए नानक उनके पीर हैं। पुरानी इमारत, जिसे गुरु नानक देव जी ने बनवाया था वो बाढ़ में बर्बाद हो गई थी। 1920-1929 तक महाराजा पटियाला भूपिंदर सिंह ने गुरुद्वारा फिर से बनवाया, जिस पर उस समय एक लाख 35 हजार 600 रुपये का खर्च आया था। आस-पास के गांवों के मुसलमान गुरुद्वारे के लंगर के लिए चंदा देते हैं। अभी गुरुद्वारे की जो इमारत है, वह नई है जो 2001 में बनाई गई थी। यहां बंटवारे के बाद पहली बार लंगर तभी लगा था।
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करतारपुर साहिब के अंदर का नजारा
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सिख इतिहास के अनुसार, श्री गुरु नानक देव जी 1522 में करतारपुर साहिब आकर रहने लगे थे। इसी पवित्र स्थान पर श्री गुरु नानक देव जी ने 22 सितंबर 1539 को आखिरी सांस ली। इससे पहले उन्होंने इसी स्थान पर दूसरे गुरु अंगद देव साहिब को गद्दी सौंपी थी। 72 साल बाद देखने को मिला कि श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारा पुराने स्थान पर था। काफी छोटा था, जहां पर श्री गुरु नानक देव जी की चादर का संस्कार किया गया था। अंदर संगत श्रद्धा से नतमस्तक हो रही थी। उसके ऊपर श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश था। बाहर दरवाजे पर श्री गुरु नानक देव जी की समाध थी, जिस पर लिखा था कि यहां पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने श्री गुरु नानक देव जी के फूल और चादर को दफनाया था।
करतारपुर साहिब के अंदर का नजारा
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मजार पर फूलों की माला चढ़ी हुई थी और बोर्ड पर उर्दू व पंजाबी में संदेश अंकित था। पांच कदम की दूरी पर कुआं था, जो संगमरमर से तैयार किया गया था। इसी कुएं से श्री गुरु नानक देव जी पानी निकालकर खेती करते थे। दूसरी तरफ बड़ा हॉल था, जहां दीवान सजाए जाते हैं। इस हॉल को भी हाल ही में नया बनाया गया है। अंदर सफेद रंग किया गया है और उसे संगमरमर पत्थर से तैयार किया गया था। गुरुद्वारा साहिब से बाहर निकलने के लिए दो दरवाजे बनाए गए हैं। एक कॉरिडोर से आने वाली संगत के लिए, जबकि दूसरा दरवाजा पाकिस्तान में आई संगत के लिए है। दोनों की पार्किंग व्यवस्था भी अलग-अलग थी। पाकिस्तान से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बनी पार्किंग की साइड एक पूरी मार्केट तैयार की गई है।