550वें प्रकाश पर्व पर पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहिब के दर्शनार्थ जाने के लिए बनाए गए करतारपुर कॉरिडोर का उद्घाटन हो चुका है। इसके साथ ही डेरा बाबा नानक से कॉरिडोर की पहली तस्वीरें भी सामने आ गईं हैं, देखिए।
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करतारपुर कॉरिडोर
- फोटो : अमर उजाला
श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व पर पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहिब के दर्शन करने के लिए बना करतारपुर कॉरिडोर आज खुल गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे जनता को समर्पित किया। वहीं उद्घाटन करते ही प्रधानमंत्री ने 550 लोगों के जत्थे को करतारपुर कॉरिडोर से पाकिस्तान के लिए रवाना भी किया।
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करतारपुर कॉरिडोर
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‘श्री ननकाना साहिब ते होर गुरुद्वारेयां, गुरुधामां दे, जिनां तों पंथ नूं विछोड़या गया है, खुले दर्शन दीदार ते सेवा संभाल दा दान खालसा जी नूं बख्शो...।’ (ननकाना साहिब और बाकी गुरुद्वारे या गुरुधाम जो बंटवारे के चलते पाकिस्तान में रह गए उनके खुले दर्शन सिख कर सकें, इसकी हम मांग करते हैं।) 1947 में हुए बंटवारे के बाद सिखों की अरदास में इस लाइन को जोड़ा गया। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि बंटवारे के बाद कई ऐतिहासिक गुरुद्वारे पाकिस्तान की तरफ रह गए। इन गुरुद्वारों में पंजा साहिब, ननकाना साहिब, डेरा साहिब लाहौर और करतारपुर साहिब खास तौर पर शामिल हैं। इन गुरुद्वारों में भारतीयों के जाने पर पाबंदी थी। लेकिन अब भारतीय सिख संगत का लंबा इंतजार शनिवार को खत्म हो गया।
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करतारपुर कॉरिडोर
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पाकिस्तान ने ऐतिहासिक गुरुद्वारा करतारपुर साहिब को भारत के साथ जोड़ने के लिए सहमति जताई। दोनों देशों के बीच एक समझौते के तहत ही इस कॉरिडोर का निर्माण किया गया है। कॉरिडोर के जरिए पाकिस्तान के कस्बे करतारपुर को पंजाब के गुरुदासपुर जिले में स्थित डेरा बाबा नानक के साथ जोड़ा गया है। भारत से लगी सीमा से करीब चार किलोमीटर दूर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के किनारे स्थित श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारा सिखों का पवित्र तीर्थ स्थल है। यह लाहौर से 120 किमी दूर स्थित है। गुरु नानक जी के माता-पिता का देहांत भी यहीं पर हुआ था। यहां बाबा नानक ने अपनी जिंदगी का अंतिम समय बिताया था। यहां उन्होंने 17 वर्ष 5 माह 9 दिन अपने हाथों से खेती तक की। इसी स्थान से उन्होंने समूची मानवता को काम करने तथा बांट कर खाने जैसे उपदेश दिए थे।
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करतारपुर कॉरिडोर
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दूसरी ओर, भारत में रावी नदी के किनारे श्री गुरु नानक देव जी का याद में बनाया गया डेरा बाबा नानक स्थित है। यह भारत-पाकिस्तान बॉर्डर से लगभग एक किलोमीटर दूर है। यह पंजाब के गुरदासपुर जिले में आता है। माना जाता है कि बाबा नानक यहां 12 साल तक रहे। मक्का जाने पर उनको दिए गए कपड़े यहां संरक्षित हैं। माघी के अवसर पर जनवरी के दूसरे सप्ताह में यहां भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। गुरु नानक देव जी ने 1506 में अपनी पहली उदासी के बाद इस जगह को ध्यान लगाने के लिए चुना था। जहां वह ध्यान लगाने बैठे थे, वहां एक कुआं था जिसे अजीता रंधावा दा खू (कुआं) के नाम से जाना जाता था।
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करतारपुर कॉरिडोर
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श्री गुरु नानक देव जी ने ही करतारपुर साहिब की स्थापना की थी और अपनी सभी उदासियों के बाद गुरु नानक देव जी करतारपुर में ही रहने लगे थे, जहां आज गुरुद्वारा करतारपुर साहिब मौजूद है। आस्था और इतिहास, दोनों के लिहाज से करतारपुर बहुत अहमियत रखता है। जब भारत का बंटवारा हुआ, तो पाकिस्तान की तरफ रहने वाले लाखों सिख भारत आ गए। उसके बाद श्री करतारपुर साहिब का स्थल बंटवारे के बाद कई सालों तक उजाड़ रहा, मगर उस दौर में भी बाबा नानक के कुछ मुसलमान भक्त वक्त-वक्त पर यहां दर्शन के लिए आते रहे। करतारपुर गुरुद्वारा में बाबा नानक की समाधि और कब्र आज भी मौजूद है।
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करतारपुर कॉरिडोर
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कब्र बाहर आंगन में है, और समाधि इमारत के अंदर। आज भी मुसलमान श्री गुरु नानक की दर पर आते हैं। सिखों के लिए बाबा नानक जहां उनके गुरु हैं, वहीं मुसलमानों के लिए नानक उनके पीर हैं। पुरानी इमारत, जिसे गुरु नानक देव जी ने बनवाया था वो बाढ़ में बर्बाद हो गई थी। 1920-1929 तक महाराजा पटियाला भूपिंदर सिंह ने गुरुद्वारा फिर से बनवाया, जिस पर उस समय एक लाख 35 हजार 600 रुपये का खर्च आया था। आस-पास के गांवों के मुसलमान गुरुद्वारे के लंगर के लिए चंदा देते हैं। अभी गुरुद्वारे की जो इमारत है, वह नई है जो 2001 में बनाई गई थी। यहां बंटवारे के बाद पहली बार लंगर तभी लगा था।
सिख इतिहास के अनुसार, श्री गुरु नानक देव जी 1522 में करतारपुर साहिब आकर रहने लगे थे। इसी पवित्र स्थान पर श्री गुरु नानक देव जी ने 22 सितंबर 1539 को आखिरी सांस ली। इससे पहले उन्होंने इसी स्थान पर दूसरे गुरु अंगद देव साहिब को गद्दी सौंपी थी।