जहां श्री गुरु नानक देव जी ठहरे थे, वो जगह 72 साल बाद श्रद्धालुओं के लिए खोल दी गई है। इसमें सिखों की गहरी आस्था है, जानिए उस पवित्र स्थल के बारे में सब कुछ।
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गुरुद्वारा चोआ साहिब
- फोटो : फाइल फोटो
हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में मौजूद ऐतिहासिक चोआ साहिब गुरुद्वारा की, जिसके दरवाजे संगत के लिए खोल दिए गए है। विभाजन के बाद से बंद इस गुरुद्वारे को खोलते समय भारत के सिख श्रद्धालु भी मौजूद थे। श्री गुरु नानक देव की 550वीं जयंती के अवसर पर इस गुरुद्वारे को खोला गया है। सिख समुदाय के लोग इसे खोलने की लंबे समय से मांग कर रहे थे।
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गुरुद्वारा चोआ साहिब
- फोटो : फाइल फोटो
एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1947 में सिख समुदाय के लोगों के पाकिस्तान से चले जाने के बाद से गुरुद्वारा बंद था। इसके बाद इस गुरुद्वारे की उपेक्षा होती रही। विश्व विरासत स्थल रोहतास किले के करीब बने इस गुरुद्वारे को उच्च अधिकारियों और सिख समुदाय के लोगों की उपस्थिति में खोला गया। इस दौरान यहां भव्य कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। गुरुद्वारा खोलने की प्रक्रिया अरदास और कीर्तन से शुरू हुई।
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गुरुद्वारा चोआ साहिब
- फोटो : फाइल फोटो
समारोह के दौरान केसरी निशान साहिब के साथ पाकिस्तानी झंडे भी लहराए गए। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के पवित्र स्थलों की देखभाल करने वाली संस्था इवैक्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) के अध्यक्ष डॉ. आमेर अहमद इस अवसर पर मुख्य अतिथि थे। पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (पीएसजीपीसी) के अध्यक्ष सरदार सतवंत सिंह भी मौजूद रहे। ईटीपीबी के प्रवक्ता आमिर हाशमी ने कहा, गुरुद्वारा चोआ साहिब विदेशी सिखों के लिए भी खोला गया है, चाहे वे कहीं से भी हों।
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गुरुद्वारा चोआ साहिब
- फोटो : फाइल फोटो
महाराजा रणजीत सिंह ने बनवाया
बता दें कि महाराजा रणजीत सिंह ने इस गुरुद्वारे को बनवाने का काम शुरू किया था। गुरुद्वारा 1834 में बनकर पूरा हुआ। 1834 में महाराजा रंजीत सिंह द्वारा गुरुद्वारा साहिब के भवन का निर्माण करवाया गया था। गुरुद्वारा साहिब का भवन तीन मंजिला है, जिसमें 23 खिड़कियां और चार-चार फुट चौड़ी दीवारों का निर्माण किया गया था। 72 वर्ष तक बंद रहे गुरुद्वारा साहिब में बनी भित्ति चित्रकला लगभग लुप्त हो चुकी है।
यह मान्यता
माना जाता है कि सिखों के पहले गुरु नानक देव इस स्थान पर ठहरे थे। वह जोगियान मंदिर से लौट रहे थे, तब यह जगह सूखे से जूझ रही थी। कहा जाता है कि गुरु नानक देव ने यहां अपने बेंत से जमीन पर मारा और एक पत्थर फेंका, जिसके बाद यहां प्राकृतिक झरने (चोहा) का पता चला।