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देखिए वो जगह, जहां साथियों की लाशें छोड़ भाग गए थे पाकिस्तानी सैनिक, मिली थी हार

Wed, 31 Jan 2018 10:31 PM IST
मोहित धुपड़/अमर उजाला, चंडीगढ़
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हुसैनीवाला बॉर्डर
1965 के युद्ध में पाकिस्तान की भारतीय फौज के हाथों करारी हार हुई थी और पाकिस्तानी सैनिक अपने साथियों की लाशों को छोड़कर भाग गए थे, देखिए वो जगह।
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हुसैनीवाला बॉर्डर
जहां आज भी पाकिस्तान के नापाक इरादों के निशान मौजूद हैं। भले ही भारत आज कश्मीर की एक इंच जमीन भी पाकिस्तान को देने के लिए तैयार न हो। लेकिन भारत-पाकिस्तान बार्डर पर एक गांव ऐसा है, जिसे हासिल करने के लिए भारत ने अपने 12 गांव पाकिस्तान को दे दिए थे। यह गांव है पंजाब के जिला फिरोजपुर का गुलाम हुसैनीवाल जो पाक सीमा पर बसा हुआ है।
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हुसैनीवाला बॉर्डर
भारत ने इस गांव को विशेष रूप से पाकिस्तान से इसलिए लिया, क्योंकि यह शहीदों की निशानियों और देशवासियों की भावनाओं के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक था। शहीदे-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधियों के अलावा भगत सिंह के साथी बटुकेश्वर दत्त की समाधि भी यहां पर है। इसके अलावा भगत सिंह की माता विद्यावती देवी, जिन्हें पंजाब माता का खिताब दिया गया था उनकी समाधि भी उनकी इच्छा के अनुसार यहीं पर है।

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हुसैनीवाला बॉर्डर
यहां पर हर साल 26 जनवरी और 15 अगस्त सहित अन्य राष्ट्रीय कार्यक्रमों का आयोजन कर देश के इन वीर जवानों को याद किया जाता है। कहते हैं कि 1965 में पाकिस्तानी सेना ने हर मोर्चे पर भारतीय फौज के हाथों करारी हार झेली थी और पाकिस्तानी सेना जलते टैंकों और अपने मरे हुए साथियों की लाशों को छोड़ कर भाग खड़ी हुई थी। 18 से 21 सितंबर तक 4 दिनों तक चले युद्ध के दौरान हुसैनीवाला गांव के लोगों ने सेना का पूरा साथ दिया।
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गांव हुसैनीवाला
पाकिस्तानी सेना ने 18-19 सितंबर 1695 की रात पूरी इंफेंट्री ब्रिगेड, टैंकों और हवाई हमले के साथ हुसैनीवाला बोर्डर पर हमला कर दिया था। उस समय हुसैनीवाला बोर्डर पर सेकेंड लाइट इंफेंट्री मराठा के जवानों ने मोर्चा संभाला हुआ था। देश के इन रणबांकुरों ने पाकिस्तानी टेंकों व फौज की परवाह किए बगैर पूरी मजबूती के साथ पाकिस्तानी सेना का मुंहतोड़ जवाब दिया और उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया।
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गांव हुसैनीवाला
हुसैनीवाला पर हमला कर समाधिस्थल को नुकसान पहुंचाना पाकिस्तान का मकसद था। सतलज नदी के किनारे हुए पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में भारतीय सेना की ओर से विरोधियों के कई टेंकों को बमों से ध्वस्त कर दिया गया था और उनके कई सैनिकों को भी अपनी गोलियों का निशाना बना कर मौत के घाट उतार दिया गया था। भारतीय वीर जवानों के अदभ्य साहस और वीरता के कारण समाधिस्थल को किसी तरह से पाकिस्तानी सेना कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकी थी।
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गांव हुसैनीवाला
इसलिए पाक से लिया हुसैनीवाला गांव
असेंबली में बम फेंकने के बाद जब अदालत ने भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई तो अंग्रेजों ने जनविद्रोह छिड़ने के डर से फांसी की सजा के लिए तय तारीख से एक दिन पहले ही तीनों लोगों को लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ा दिया। इसके बाद रात के अंधेरे में जेल की पिछली दीवार को तोड़ा गया और तीनों शवों को लाहौर से करीब 45 किमी दूर गांव हुसैनीवाला के साथ गुजरती सतलुज दरिया किनारे लाया गया।

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गांव हुसैनीवाला
यहां बिना रीति रिवाज के तीनों के शवों को जलाकर अवशेष को आनन-फानन में सतलुज दरिया में फेंक दिया गया था। इसके बाद गुलाम हुसैनीवाला में शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की समाधियां बनाई गईं। बंटवारे के बाद गुलाम हुसैनीवाला गांव पाकिस्तान में चला गया। लेकिन देशवासियों की भावनाओं के मद्देनजर वर्ष 1961 में भारत ने सुलाईमान के हेड वर्क्स क्षेत्र के अपने 12 गांव पाकिस्तान को देकर हुसैनीवाला को लिया।

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गांव हुसैनीवाला
आज गांव की ऐसी है हालत
ऐतिहासिक गांव हुसैनीवाला के बाहर एक दशकों पुराना माइल स्टोन लगा हुआ है जिस पर अंकित है कि बार्डर पार पाकिस्तान का जिला कसौर महज 11 और लाहौर 45 किलोमीटर दूर है। यहां से आगे जाने पर गांव हुसैनीवाला पड़ता है।  गांव के मलकीत सिंह, पूर्व पंच मंजीत सिंह, स्वर्ण सिंह, सुरजीत, पूर्व सरपंच मदनलाल, पूर्व सरपंच कुरछेद, नैदराम आदि ने बताया कि गांव में सरकारी ट्यूबवेल तक नहीं है।

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गांव हुसैनीवाला
ग्रामवासी हैंडपंप का खारा और गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। इसे पीकर ग्रामीण बीमार होते रहते हैं। ग्रामवासियों ने बताया कि इसका पानी पीने से बच्चों की ग्रोथ पर भी प्रभाव पड़ रहा है। गांव में कोई कम्युनिटी सेंटर व खेल की मैदान नहीं है। पंचायत घर भी अधूरा पड़ा है। सरपंच मदनलाल के अनुसार ग्रांट ही पर्याप्त नहीं आती तो विकास कार्य कैसे होंगे। उन्होंने बताया कि गांव के जोहड़ गंदगी और गाद से अटे पड़े हैं, नालियां जर्जर व टूटी हैं।

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गांव हुसैनीवाला
मुख्य सड़क पर ही गांव का प्राइमरी स्कूल बना है। स्कूल की दीवारें जर्जर हैं और कमरे बगैर छत के हैं। ग्रामीणों ने बताया कि स्कूल में सौ से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं लेकिन डेस्क मात्र चालीस के करीब हैं। बाकी बच्चे ठंड हो या गर्मी जमीन पर बैठकर पढ़ते हैं। ग्रामीणों के अनुसार स्कूल भी प्राइमरी से अपग्रेड होना चाहिए। गांव की मुख्य सड़क से लेकर अधिकतर गलियां कच्ची हैं।

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गांव हुसैनीवाला
शहीद स्थल को देखकर लगता है कि प्रशासन का उस तरफ कोई ध्यान नहीं है।  शहीदों की प्रतिमाओं पर भी धूल की परत जमी हुई है। हुसैनीवाला से पाकिस्तान के कसौर तक जाने वाली ऐतिहासिक रेल लाइन जहां से होकर गुजरती थी वह ढांचा जर्जर हो रहा है। पास में बने पार्क की हालत बदतर है। साफ-सफाई का माकूल इंतजाम भी नहीं है। शहीद स्मारकों के  पास बना तालाब सूखा पड़ा है। यहां बनी पार्किंग में सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है।
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गांव हुसैनीवाला
शहीद स्मारक और गांव के हालात को लेकर प्रशासन गंभीर है। इसका कायाकल्प किया जाएगा। गांव में सुविधाएं मुहैया कराने के लिए एक डीपीआर तैयार की जा रही है। यहां जो भी कमियां है, उसे दुरुस्त की जाएंगी और ग्रामीणों को भी सुविधाएं दी जाएंगी।
- रामवीर, डीसी, फिरोजपुर
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