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काम की बात: क्या होता है जीआई टैग और किस प्रोडक्ट को मिलता है ये? जानिए इसके बारे में सबकुछ

Wed, 27 Oct 2021 09:05 AM IST
सोनू शर्मा बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
किसी प्रोडक्ट को लेकर अक्सर आप जीआई टैग के बारे में सुनते होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जीआई टैग आखिर होता क्या है और यह किसे मिलता है? दरअसल, किसी भी वस्तु के लिए जीआई टैग बहुत जरूरी होता है। ये टैग बताते हैं कि प्रोडक्ट किस जगह का है, यानी ये टैग ही प्रोडक्ट की पहचान होते हैं। जीआई का मतलब होता है जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी भौगोलिक संकेतक। इसका इस्तेमाल ऐसे उत्पादों के लिए किया जाता है, जिनका एक विशिष्ट भौगोलिक मूल क्षेत्र होता है। किसी प्रोडक्ट को ये खास भौगोलिक पहचान मिल जाने से उस प्रोडक्ट के उत्पादकों को उसकी अच्छी कीमत मिलती है। इसका फायदा ये भी है कि अन्य उत्पादक उस नाम का इस्तेमाल कर अपने सामान की मार्केटिंग भी नहीं कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि इसकी शुरुआत कब हुई और इसकी जरूरत ही क्यों पड़ी? 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
साल 2003 में संसद में जीआई कानून पास हुआ था। यह भारत की विरासत और पहचान को बचाने और उसे दुनियाभर में प्रसिद्ध करने की एक कानूनी कवायद है। दरअसल, भारत के मशहूर उत्पादों की नकल कर नकली सामान बाजार में खूब बेचे जाने लगे थे। इससे देश की धरोहर और विरासत को खतरा महसूस हुआ, जिसके बाद असली प्रोडक्ट्स की गरिमा को बनाए रखने के लिए जीआई टैग का कानून लाया गया। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
जीआई टैग वाणिज्य मंत्रालय के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्री प्रमोशन एंड इंटरनल ट्रेड की तरफ से दिया जाता है। इसका पंजीकरण 10 साल के लिए मान्य होता है। किसी खास फसल, प्राकृतिक और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स को यह टैग दिया जाता है। साल 2004 में देश में सबसे पहले दार्जिलिंग की चाय को जीआई टैग मिला था।  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
देश में अब तक 300 से अधिक उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है। इसमें हिमाचल का काला जीरा, छत्तीसगढ़ का जीराफूल, ओडिशा की कंधमाल हल्दी, कर्नाटक की कुर्ग अरेबिका कॉफी, केरल के वायनाड की रोबस्टा कॉफी, आंध्र प्रदेश की अराकू वैली अरेबिका, कर्नाटक की सिरसी सुपारी जैसे कई उत्पाद शामिल हैं। 
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