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आखिर फलस्तीनी क्षेत्र में बसीं यहूदी बस्तियों पर क्यों कब्जा करना चाहता है इस्राइल?

Mon, 06 Jul 2020 11:04 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाल, नई दिल्ली
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वेस्ट बैंक - फोटो : सोशल मीडिया
फलस्तीनी क्षेत्र पर बसीं इस्रायली बस्तियों वाले इलाके को कब्जे में लेने के लिए इस्रायली संसद में मतदान होना है। इस्रायल इस पर अपना दावा करता आया है। बहुत से देश इन यहूदी बस्तियों को अवैध मानते हैं, हालांकि इस्रायल को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंपका समर्थन है। तो इस्रायल की ये बस्तियां कहां पर हैं और अगर फलस्तीन इसको अपना क्षेत्र बता कर दावा करता है, तो इस पर यहूदी बस्तियां कैसे आ गईं? आगे हम इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
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अमेरिका का समर्थन

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इस्रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू - फोटो : Social Media
संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघके अधिकतर देश वेस्ट बैंक में इस्रायली बस्तियोंको अंतराराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते आए हैं। आधिकारिक तौर पर अमेरिका भी इस बात पर सहमत था, लेकिन नवंबर 2019 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने स्पष्टकर दिया कि वो इन बस्तियों को अब अवैध नहीं मानेगा। अमेरिका के समर्थन के बाद इस्रायली संसद इस पर मतदान कर सकती है कि वो कब इसको कब्जे में ले।

फलस्तीनियों ने इसका जोरदार विरोध किया है। उनके लिए यह फलस्तीनी जमीन के एक टुकड़े को काटने जैसा है जो पहले से ही कई टुकड़ों में है। वे उस जमीन को खो देंगे जो उन्हें लगता है कि भविष्य में वो उनके एक देश के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यह अवैध है या नहीं वो एक मुद्दा है लेकिन यहां पर बस्तियां हैं और वो लगातार फैल रही हैं।
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वेस्ट बैंक का नक्शा - फोटो : बीबीसी
1967 में इस्रायल-अरब युद्ध के बाद यह इलाका कैसे बदला है वो आप इस तस्वीर में देख सकते हैं। नीला वाला क्षेत्र इस्रायल है जबकि हरा वाला वेस्ट बैंक है। फलस्तीनी वेस्ट बैंक को अपने भविष्य के देश के एक हिस्से के तौर पर देखते हैं लेकिन युद्ध के बाद इस्रायल ने वहां बस्तियां बना दी। तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि कैसे यहूदी बस्तियां इस इलाके में फैली हैं। तस्वीर में नीली बिंदियां उन बस्तियों को दिखाती हैं और इन्हें इस्रायली सरकार का समर्थन हासिल रहा है। इसमें अनौपचारिक बस्तियां भी हैं, जिन्हें आउट पोस्ट्स कहा जाता है वो इन तस्वीरों में शामिल नहीं हैं।

लगातार फैली हैं ये बस्तियां

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वेस्ट बैंक - फोटो : सोशल मीडिया
वेस्ट बैंक में इस छोटी सी जमीन पर 30 लाख लोग रहते हैं जिनमें 86 फीसदी फलस्तीनी और 14 फीसदी (4,27,800) इस्रायली बस्तियों के लोग हैं। वे अपने-अपने समुदाय में रहते हैं और उन्हें एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं रहता। अधिकतर इस्रायली बस्तियां 70, 80 और 90 के दशक में बसाई गईं लेकिन बीते 20 सालों में उनकी जनसंख्या दोगुनी हो चुकी है। इस्रायल इन बस्तियों में बिजली-पानी जैसी सुविधाएं देता है और उनको इस्रायली सेना सुरक्षा देती है।

फलस्तीनी क्षेत्र में इस्रायली बस्तियां बिखरी हुई हैं। इनकी इस्रायली सुरक्षाबल रक्षा करते हैं और फलस्तीनियों का इनमें आ पाना नामुमकिन है। इसके कारण फलस्तीनी शहर इनसे कटे रहते हैं जिसके कारण फलस्तीनी क्षेत्र में ट्रांसपोर्ट कनेक्शन और बुनियादी ढांचे का विकास बेहद कठिन हो जाता है। सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि बीते समय में यह बस्तियां काफी फैल गई हैं। 2004 में गिवात जीव में 10,000 लोग रहते थे लेकिन अब इसमें 17,000 लोग हैं। यह पश्चिम की ओर फैला है इसमें नए घर जुड़े हैं, यहूदी प्रार्थना स्थल और शॉपिंग सेंटर बने हैं। यह इस्रायली बस्तियां कहीं-कहीं बड़ी हैं और कहीं इसमें कुछ हजार लोग हैं। मोडीन इलीट सबसे बड़ी इस्रायली बस्ती है जिसमें 73,080 लोग रहते हैं। बीते 15 सालों में इसकी आबादी तीन गुना हो चुकी है। पीस नाव नामक संगठन ने इस आंकड़े को इकट्ठा किया है जो इन बस्तियों का विरोध करती है।
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इस्रायली बस्तियों में प्रजनन दर सबसे अधिक

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : बीबीसी
डोनाल्ड ट्रंप ने भविष्यके लिए इन बस्तियों के लिए जो योजना पेश की है उसके तहत इनमें सभी बस्तियों पर चार साल के लिए निर्माण पर रोक रहेगी। अगर इसमें निर्माण कार्य नहीं भी होता है तो भी इस क्षेत्र की आबादी बढ़ेगी क्योंकि यहां रहने वाले लोगों की प्रजनन दर बहुत अधिक है। इन बस्तियों में रहने वाली महिलाओं के औसतन सात बच्चे हैं। इस्रायल में वैसे भी प्रजनन दर काफी अधिक है। इसराल में यह दर प्रति महिला औसतन 3।1 बच्चों की है जबकि यूरोपीय संघ में यह दर 1।58 है।

इस्रायली बस्तियों में यह दर बहुत अधिक है। अगर मोडीन इलीट बस्तीको देखें तो इसकी प्रजनन दर इस्रायल या फलस्तीनी क्षेत्र के किसी भी शहर से सबसे अधिक है। यहां औसतन हर महिला के 7।59 बच्चे हैं। वहीं, वेस्ट बैंक में ही फलस्तीनियों के बेहद कम बच्चे हैं। फलस्तीनी महिलाओं के औसतन 3।2 बच्चे हैं। फलस्तीनी और इस्रायली दोनों इस जमीन पर अपना-अपना दावा करते हैं लेकिन फलस्तीनियों का कहना है कि जब तक यहां से इस्रायली बस्तियां नहीं हटाई जाती हैं तब तक उनका एक देश नहीं बन सकता है।
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इस्रायली वेस्ट बैंक में क्यों रहना चाहते हैं?

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वेस्ट बैंक - फोटो : सोशल मीडिया
इन बस्तियों में कुछ लोगों के आने की वजह इस्रायली सरकार से मिलने वाली सब्सिडी भी है। यहां पर घर सस्ते हैं और वो बेहतर जीवन जी सकते हैं। वहीं, कुछ लोग यहां पर अपने धार्मिक समुदाय के प्रति गहरे झुकाव के कारण आए हैं क्योंकि उनका मानना है कि हिब्रू बाइबिल में ईश्वर ने उन्हें यहां बसने का जिम्मा सौंपा था। यहां बसे लोगों में एक तिहाई बेहद रूढ़िवादी हैं। इन समुदायों के परिवार अक्सर बेहद बड़े हो जाते हैं जिसके कारण इन पर ग़रीबी छा जाती है। यहां पर गुणवत्तापूर्ण जीवन भी बड़ा मुद्दा है। हालांकि, यहां रहने वाले कुछ लोगों का मानना है कि यह उनके पूर्वजों की जमीन है जिसके कारण यहां रहना उनका अधिकार है।
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दो राष्ट्रों का समाधान कौन चाहता है?

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वेस्ट बैंक - फोटो : सोशल मीडिया
बेहद कम लोग इस जमीन को दो स्वतंत्र देशों में बांटने के विचार का समर्थन करते हैं। 2006 में 71 फीसदी फलस्तीनी और 68 फीसदी इस्रायली इस विचार का समर्थन करते थे जबकि 2018 में यह संख्या घट गई और 44 फीसदी फलस्तीनी और 55 फीसदी इस्रायली इसका समर्थन करते थे। इसके उलट 2018 तक इस्रायल और फलस्तीनके एक राष्ट्र में विलय पर 36 फीसदी फलस्तीनी, 19 फीसदी यहूदी और 56 फीसदी इस्रायली अरब सहमत थे।

'दो राष्ट्रों के समाधान' को लेकर एक बुरी खबर यह है कि इस समाधान को लेकर युवा लोगों की संख्या काफी कम है। इस्रायल में 18-24 वर्ष की आयु के 27 फीसदी ही दो राज्यों के इस समाधान का समर्थन करते हैं।
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