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आखिर अंधेरा होने पर क्यों बदल जाता है समुद्र का रंग?

Mon, 13 Jul 2020 08:50 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
समंदर दिन की रोशनी में जितना खूबसूरत लगता है, उससे कहीं ज्यादा हसीन रात के अंधेरे में लगता है। समुद्र में रहने वाले बहुत से जीव जो दिन में नहीं निकलते, वो रात में बाहर आते हैं। पानी की लहरें जब उफान के साथ उठती हैं तो लगता है वो अपने साथ अनगिनत छोटी-छोटी नीली बत्तियां समेटे हुए हैं। सवाल ये है कि आखिर समुद्र में ये नीली टिमटिम रोशनी आती कहां से है?
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
असल में ये कुदरती बिजली की चमक होती है। समंदर के बहुत से जीवों में ये खूबी होती है कि उनके शरीर से चमक पैदा होती है। समुद्र में डाइनोफ्लैगलेट्स नाम के जीव पाए जाते हैं। ये रात के अंधेरे में नीले रंग की रोशनी छोड़ते हैं। कैरेबियन देशों पुएर्तो रिको और जमैका के पास के समुद्री इलाकों में ये जीव बड़ी तादाद में पाए जाते हैं। रात के वक्त अक्सर इनकी चमक देखी जाती है। खास तौर से तब, जब कोई बड़ा जीव या जहाज उस इलाके से गुजरता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
समुद्र के अंदर पाई जाने वाली घास और फफूंद में भी ये रोशनी पैदा करने की क्षमता होती है। जब पानी की लहरें उठती है तो यह घास हिलने लगती है। लगता है कि लहरों के बीच नीले बल्ब टिमटिमा रहे हों। कभी-कभी डाइनोफ्लैगलेट्स की संख्या काफी तेजी से बढ़ती है और ये दिन में भूरे लाल रंग के लगते हैं। इन्हें लाल ज्वार के नाम से भी जाना जाता है। इनमें से कुछ जहरीले भी होते हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
रात के अंधेरे में समुद्र कभी-कभी दूधिया सफेद भी नजर आता है। इसे मिल्की-सी कहा जाता है। हालांकि ऐसा बहुत कम देखने को मिला है। 1915 के बाद कुछ बार ही समुद्र का ये नजारा देखा गया होगा। ये मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी हिंद महासागर में, जावा और इंडोनेशिया के पास के समुद्र में देखने को मिलता है।

समुद्र के इस रूप के लिए डाइनोफ्लैगलेट्स जिम्मेदार नहीं होते हैं। बल्कि कहा जाता है कि रोशनी छोड़ने वाले बैक्टीरिया समुद्र की सतह पर जमा हो जाते हैं, जिसके चलते सफेद रंग नजर आता है। जब ये बैक्टीरिया बहुत ज्यादा संख्या में जमा हो जाते हैं, तो समुद्र बर्फ की चादर के समान लगने लगता है। कुदरत के इस फितरी अमल की असल वजह क्या है, वैज्ञानिकों को इसे जानने का मौका कम ही मिल पाया है। 2005 में रिसर्चरों ने मिल्की-सी की कुछ सैटेलाइट इमेज जमा की थी। समुद्र में ये नजारा लगातार तीन रातों तक बना रहा था फिर धीर-धीरे कम होने लगा।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अंधेरे में चमकने वाले जानवर
समुद्र की गहराई में जितने भी जीव पाए जाते हैं, उनमें से बहुतों में नीली रोशनी पैदा करने की क्षमता होती है। कुछ जीवों की दुम चमकती है तो कुछ का पूरा शरीर। बहुत सी मछलियां पूरी तरह से चमकती हैं, तो कुछ की सिर्फ आंखें चमकती है।

रात के अंधेरे में समुद्र की गहराई में रौशनी का ये इकलौता जरिया होती हैं। जिन मछलियों की आंखें चमकती हैं, वो जरूरत के हिसाब से अपनी आंख खोलती और बंद करती हैं। जहां उन्हें रोशनी की जरूरत होती है, वहीं अपनी आंख घुमाती हैं। इनकी रोशनी की मदद से दूसरे बैक्टीरिया भी घूमते हैं। रिसर्च बताते हैं कि जिन जीवों में रोशनी पैदा करने की क्षमता नहीं होती, उनका इस खूबी वाले जीवों से अच्छा रिश्ता होता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
चांदनी रात का असर
चांदनी रात का कवियों और शायरों ने खूब जिक्र किया है। कभी माशूका की याद में, तो कभी उसकी खूबसूरती बयां करने के लिए चांद की मिसालें दी गई हैं। चांदनी रात में इक नशा सा होता है। इसका असर सिर्फ इंसानों पर पड़ता है, ऐसा नहीं है। ऑस्ट्रेलिया की मशहूर मूंगे की चट्टान, यानी ग्रेट बैरियर रीफ में चांदनी रात का संबंध कुदरत की बुनियादी क्रिया यानी सेक्स होता है। मूंगे की करीब 130 प्रजातियां चांदनी रात में यौन क्रिया करती हैं। मूंगे की ये नस्लें एक ही वक्त में एकसाथ अंडे देती हैं।

करीब आधे से एक घंटे के भीतर इनके बीच सेक्स होता है। पानी में घुलने से पहले ये कुछ वक्त के लिए ये वहीं जमा रहते हैं, और किसी खूबसूरत चट्टान की तरह नजर आते हैं। लेकिन ये नजारा सिर्फ चांदनी रात में ही देखने को मिलता है। रिसर्चरों के मुताबिक समुद्र का ये अद्भुत नजारा देखने लायक होता है। ये मंजर पूरी तरह से रूहानी लगता है। चांद की रौशनी शायद इन्हें एक साथ जमा होने का सिग्नल देती है। माना जाता है कि मूंगे के पास फोटोरिसेप्टर होता है जो चांद की रौशनी के अलग-अलग रूप को पकड़ता रहता है। इससे ही उसे अंडे और स्पर्म रिलीज करने में मदद मिलती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
तारों की रोशनी भी आती है काम
चांद की रोशनी मूंगे के लिए जितनी मुफीद है, सील मछली के लिए उतनी ही खतरनाक है। खास तौर से सर्दी के मौसम में चांदनी रातें इनके लिए सबसे मुश्किल वाली होती हैं। क्योंकि शार्क जैसी खतरनाक मछलियां इन्हें अपना शिकार बना लेती हैं। कई बार ये भी देखा गया है कि सूरज निकलते समय भी शार्क ने सील पर हमला किया है।

माना जाता है कि चांद और उगते सूरज की मिली-जुली रोशनी शार्क की हमला करने की शक्ति को कम कर देती है। और इस वक्त में सील मछली की ताकत बढ़ जाती है। शार्क, चांद की रोशनी में ज्यादा तेजी से काम करती है, जबकि सील सिर्फ तारों की रोशनी से भी अपना काम चला लेती है। कुछ रिसर्च ये भी बताती हैं कि सुबह और शाम की मद्धम रोशनी में भी सील अपने खाने की जगह और साहिल दोनों को देख सकती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
हर रात सतह पर आते हैं कुछ जीव
दिन में समुद्र की तलहटी में रहने वाला जम्बो स्क्विड रात के अंधेरे में खाना तलाशता हुआ समुद्र की सतह पर खुद को छुपा लेता है। सूरज के डूबने के साथ ही ये ऊपर आते हैं और सूरज निकलने के साथ ही वापस गहरे पानी में चले जाते हैं।

स्क्विड हर शाम करीब हजार मीटर की दूरी तय करके समुद्र की सतह पर आते हैं। जम्बो स्क्विड की लंबाई 5 फीट से लेकर 13 मीटर तक हो सकती है। इनका रंग चमकीला लाल होता है, इसीलिए इन्हें रेड डेविल के नाम से भी जाना जाता है। चारों और निकली अपनी भुजाओं से ये शिकार को कसकर पकड़ लेता है, और उसे फाड़ डालता है। लेकिन ये इंसान पर बहुत कम हमला करता है। वैसे देखा जाए तो किसी भी जानवर से इंसान को कम बल्कि इंसान से उस को खतरा ज्यादा है।

बहरहाल समुद्र के अंदर की दुनिया बहुत हसीन, रंगीन और खूबसूरत है। चांद इसकी खूबसूरती में और चार चांद लगा देता है।
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