मारे गए इन लोगों में हमलावर हूतू समुदाय के उदारवादी लोग भी शामिल थे। इन में कारूहिंबी की पहली बेटी भी थीं। इस नरसंहार के दो दशक बाद अपने दो छोटे कमरों के घर में द इस्ट अफ्रीकन से बात करते हुए उन्होंने कहा था। "उस नरसंहार के दौरान मैंने इंसान के दिल का कालापन देखा था।" इसी घर में उन्होंने उन लोगों को छुपाया था और उनकी जान बचायी थी। बीते सोमवार को रवांडा की राजधानी किगाली से करीब एक घंटे की दूरी पर पूर्व में स्थित मासूमो गांव में जूरा कारूहिंबी की मौत हो गई। किसी को नहीं पता है कि वो कितने साल की थीं। अधिकारिक दस्तावेजों में उनकी उम्र 93 साल है जबकि वो अपने आप को सौ बरस से ज्यादा का बताती थीं। जो भी हो, लेकिन जब हूतू मिलिशिया ने उनके गांव पर हमला किया था तब वो बहुत युवा नहीं थीं।