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अफगानिस्तान: आखिर तालिबान का दोबारा उभरना भारत के लिए कैसे हो सकता है खतरनाक?

Fri, 09 Jul 2021 04:51 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
अफगानिस्तान से अमेरिका और नाटो सेना की वापसी शुरू हो गई है। लगभग दो दशक (20 साल) बाद अमेरिकी सैनिकों की वापसी होने के साथ ही अफगानिस्तान में आतंक का दूसरा नाम तालिबान का कब्जा फिर से शुरू हो गया है। हालांकि, तालिबान द्वारा कई जिलों को अपने नियंत्रण में लाने के लिए चलाए जा रहे विजय अभियान को बादगीस प्रांत के कला-ए-नव शहर में रोक दिया गया है। यहां कब्जा जमा चुके तालिबान से अफगान बलों ने शहर को दोबारा अपने नियंत्रण में ले लिया है। इस दौरान तालिबान को शहर से खदेड़ने में कम से कम 69 आतंकवादी मारे गए और 23 घायल हो गए। इन सब चीजों को देखकर अब फिर से तालिबान के दोबारा उभरने का डर गहरा चुका है, जिससे पड़ोसी देश पाकिस्तान समेत भारत को भी खतरा है।
 
अफगानिस्तान और तालिबान के पेच समझने से पहले हम एक बार पूरी कहानी समझते हैं कि आखिर अमेरिकी सेना अफगानिस्तान क्यों पहुंची और अब वापस क्यों लौट रही है?
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अमेरिका-अफगानिस्तान - फोटो : iStock
अमेरिका में 9/11 आतंकी हमले की जड़ तालिबान से ही जुड़ी हुई थी और साल 2001 में तालिबान के खात्मे के लिए अमेरिका ने अपनी सेना अफगानिस्तान भेजी। तत्कालीन अमेरिका सरकार का ऐसा मानना था कि अफगानिस्तान ही तालिबानियों की शरणस्थली है और अलकायदा से जुड़े लोग यहीं पर रहते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : ANI
अमेरिकी सैनिक तब से ही लगातार अफगानिस्तान में रहते हुए आतंकियों का सफाया करते रहे। इतना ही नहीं वे अफगानी सेना को भी ट्रेनिंग देने लगें, ताकि वो खुद आतंक का मुकाबला कर सकें। हालांकि, कुछ सालों से अमेरिकी जनता समेत नेता भी अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुलाने मांग करने लगे। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह सैनिकों के अपने परिवार से दूरी के कारण आई अस्थिरता थी।

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तालिबान (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
अमेरिका की जनता का ऐसा मानना है कि हमारे सैनिक बेवजह ही दशकों से युद्ध के हालात में रखे गए हैं। इसके साथ ही अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों के रहने से असंतोष की एक वजह ये भी है कि विदेशी जमीन पर सैनिकों की तैनाती का ज्यादातर खर्च अमेरिकी लोगों से टैक्स के तौर पर वसूला जाता है। पैसों के अलावा अमेरिकी सैनिकों को कई मानवीय समस्याओं से भी जूझना पड़ता है।
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तालिबान (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Afghanistan Times
आपको बता दें कि अमेरिकी सैनिकों को वापस लौटने का वादा पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ही अपने कार्यकाल में किया था और जाने से पहले उन्होंने अपने सैनिकों को लौटने का एलान भी कर दिया। उनके बाद नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी इसे जारी रखा।
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अमेरिकी सैनिक - फोटो : सोशल मीडिया
सैनिकों के लौटने का सिलसिला शुरू होते ही अफगानिस्तान एक बार फिर चरमपंथियों की हिंसा में सुलगने लगा है। पाकिस्तान भी इससे डरा हुआ है कि सैनिकों के खाली होते ही अफगानिस्तान में अशांति फैल जाएगी। फिलहाल तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं।
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कंधार हाईजैक (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला
साल 2001 में अमेरिकी सैनिकों के दखल के बाद से ही तालिबान सुस्त पड़ गया था, लेकिन अब वो फिर से सिर उठा रहा है। इससे ना केवल पाकिस्तान बल्कि बल्कि भारत को भी खतरा हो सकता है। कंधार विमान अपहरण कांड इसी का एक उदाहरण हैं। पाकिस्तान की सरकार भले ही तालिबान का विरोध करती है, लेकिन लगातार यहीं से आतंकी तालिबान सेना में भर्ती होते हैं। ऐसे में एक बड़ा डर ये भी है कि पाकिस्तान तालिबान के जरिए कश्मीर में अपनी आतंकी गतिविधियां न बढ़ा दे।
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