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इस मंदिर में भगवान शिव से पहले की जाती है रावण की पूजा, बड़ा गहरा है ये रहस्य

Wed, 15 May 2019 01:45 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भगवान शिव और रावण - फोटो : Social media
दुनिया में ऐसे कई चमत्कारी मंदिर हैं, जो अपने आप में एक अनोखी कहानी समेटे हुए हैं। वैसे तो दुनियाभर में भगवान शिव के अनेक मंदिर हैं, जहां उनकी बड़ी श्रद्धा से पूजा होती है, लेकिन आज हम आपको भगवान शिव के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां भगवान से पहले रावण की पूजा होती है। इसके पीछे एक गहरा रहस्य छुपा हुआ है। 
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कमलनाथ महादेव मंदिर - फोटो : Social media
इस मंदिर को कमलनाथ महादेव के नाम से जाना जाता है। झीलों की नगरी उदयपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर झाड़ोल तहसील में आवारगढ़ की पहाड़ियों पर शिवजी का यह प्राचीन मंदिर स्थित है। पुराणों के अनुसार इस मंदिर की स्थापना खुद लंकापति रावण ने की थी। 
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रावण - फोटो : Social media
कहते हैं कि यही वह स्थान है, जहां रावण ने अपना सिर काटकर भगवान शिव को अग्निकुंड में समर्पित कर दिया था। तब रावण की इस भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने रावण की नाभि में अमृत कुण्ड स्थापित किया था। 

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रावण - फोटो : File photo
इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान शिव से पहले रावण की पूजा की जाती है, क्योंकि मान्यता है कि शिवजी से पहले अगर रावण की पूजा नहीं की जाए तो सारी पूजा व्यर्थ जाती है। 
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भगवान शिव और रावण - फोटो : Social media
पुराणों में कमलनाथ महादेव की एक कथा लिखी हुई है, जिसके अनुसार एक बार रावण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत पर पहुंचा और तपस्या करने लगे। उसके कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने रावण से वरदान मांगने को कहा। तब रावण ने भगवान शिव से लंका चलने का वरदान मांग लिया। तब भोलेनाथ शिवलिंग के रूप में उसके साथ जाने को तैयार हो गए।
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शिवलिंग - फोटो : File photo
भगवान शिव ने रावण को एक शिवलिंग दिया और यह शर्त रखी कि अगर लंका पहुंचने से पहले तुमने शिवलिंग को धरती पर कहीं भी रखा तो मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगा। चूंकि कैलाश पर्वत से लंका का रास्ता काफी लंबा था और रास्ते में रावण को थकान महसूस हुई तो वो आराम करने के लिए एक स्थान पर रुक गया और ना चाहते हुए भी उसने शिव लिंग को धरती पर रख दिया।
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रावण - फोटो : Social media
आराम करने के बाद रावण ने शिवलिंग को उठाना चाहा, लेकिन वह टस से मस ना हुआ। तब रावण को अपनी गलती का अहसास हुआ और पश्चाताप करने के लिए वह उसी जगह पर फिर से तपस्या करने लगे। वो दिन में एक बार भगवान शिव का सौ कमल के फूलों के साथ पूजन करता था। ऐसा करते-करते रावण को साढ़े बारह साल बीत गए। 
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कमलनाथ महादेव - फोटो : Social media
जब ब्रह्मा जी को इस बात का पता लगा कि रावण की तपस्या सफल होने वाली है तो उन्होंने उसकी तपस्या विफल करने के लिए पूजा के वक्त एक कमल का फूल कम कर दिया। बाद में जब रावण ने देखा कि भगवान शिव की पूजा करने के लिए एक फूल कम पड़ रहा है तो उसने अपना सिर काटकर भगवान शिव को अर्पित कर दिया। रावण की इस भक्ति से भगवान शिव प्रसन्न हो गए और उन्होंने वरदान स्वरुप उसकी नाभि में अमृत कुण्ड की स्थापना कर दी। साथ ही कहा कि यह स्थान अब से कमलनाथ महादेव के नाम से जाना जाएगा। 
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