पुराने जमाने में राजा-महाराजा अक्सर अपने राज्य में जगह-जगह कुआं खुदवाते रहते थे, ताकि पानी की कमी न हो। भारत में तो ऐसे हजारों कुएं हैं, जो सैकड़ों साल पुराने हैं और कुछ तो हजार साल भी। एक ऐसे ही कुएं के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं, जिसे 'रानी की बावड़ी' कहा जाता है। दरअसल, बावड़ी का मतलब सीढ़ीदार कुआं होता है। 'रानी की बावड़ी' का इतिहास 900 साल से भी ज्यादा पुराना है और यहां भारी संख्या में पर्यटक घूमने के लिए आते हैं। बता दें कि साल 2014 में यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत स्थल घोषित किया था।
गुजरात के पाटण में स्थित इस प्रसिद्ध बावड़ी को रानी की वाव भी कहा जाता है। कहते हैं कि रानी की वाव (बावड़ी) का निर्माण 1063 ईस्वी में सोलंकी राजवंश के राजा भीमदेव प्रथम की स्मृति में उनकी पत्नी रानी उदयामति ने करवाया था। रानी उदयमति जूनागढ़ के चूड़ासमा शासक रा खेंगार की पुत्री थीं।