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क्या सच में अंतरिक्ष से धरती पर आया है सोना? हैरान करते हैं वैज्ञानिकों के दावे

Tue, 06 Oct 2020 11:00 AM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में सोना विशेष महत्व की धातु है। इस पीली धातु की उत्पति को लेकर तमाम तरह की कहानियां प्रचलित है। वैज्ञानिक समुदाय में भी एक राय नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों के एक बड़े तबके का मानना है कि धरती के भीतर मौजूद सोना धरती की संपत्ति नहीं है और यह अंतरिक्ष से उल्कापिंडों के जरिए आया है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
इस कीमती पीली धातु की उत्पति के बारे में वैज्ञानिक जो तर्क पेश कर रहे हैं उसपर शायद ही किसी को भरोसा हो, लेकिन वैज्ञानिकों के पास इसके ठोस सबूत हैं। मूल रूप से मुलायम धातु सोना के बारे में वैज्ञानिक जॉन एमस्ली का दावा है कि यह धातु अंतरिक्ष से उल्का पिंडों के रूप में धरती पर आया और इसी कारण यह धरती के बाहरी हिस्से में पाया जाता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वैसे सोने की उपलब्धता के बारे में पिछले कुछ दशकों से चर्चा में आए इस सिद्धांत पर वैज्ञानिक समुदाय को मुहर लगानी है। इस सिद्धांत की वकालत करने वालों का कहना है कि धरती के बाहरी तह, जो करीब 25 माइल मोटा है, में घूलने वाले हर 1000 टन धातुओं में केवल 1.3 ग्राम सोना था। करीब साढ़े चार अरब साल पहले धरती की उत्पति के बाद इसकी सतह ज्वालमुखी और पिघले हुए चट्टानों से भरी पड़ी थी। इसके बाद लाखों सालों में धरती के बाहरी परत में घुलते हुए लोहा धरती के केंद्र में पहुंच गया है। संभवतः इसके साथ सोना भी पिघलकर धरती के बाहरी परत में मिल गया।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
इम्पीरियल कॉलेज, लंदन के भूगर्भशास्त्री मथिया विलबोल्ड का कहना है कि इस तर्क पर इतनी आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता था इसलिए विज्ञान को इसकी विवेचना करनी पड़ी। विलबोल्ड का कहना है, 'सिद्धांत यह है कि धरती के मुख्य हिस्से के गठन के बाद उल्का पिंडों की बौछार हुई जो धरती से टकराए। इन उल्का पिंडों में कुछ मात्रा में सोना था और इसने धरती के बाहरी सतह को सोने से भर दिया।' विलबोल्ड ने कहा कि यह सिद्धांत उल्का पिंडों की गतिविधियों से मेल खाता है, जैसा कि वैज्ञानिक समझते हैं। यह घटना करीब 3.8 अरब साल पहले घटी होगी।
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चंद्रमा की सतह - फोटो : सोशल मीडिया
दरअसल, सन 1970 के दशक में आपोलो के चंद्रमा पर उतरने के बाद उल्कापिंडों के जरिए धरती पर सोना आने का सिद्धांत दिया गया। वैज्ञानिकों ने चंद्रमा पर चट्टानों से लिए गए नमूनों में उसकी सतह से लिए गए नमूनों की तुलना में कम रेडियम और सोना पाया। यह धरती की सतह और चट्टानों में पाए जाने वाले सोने से भी कम था। इससे यह माना गया कि धरती और चांद पर अंतरिक्ष से रेडियम युक्त उल्कापिंड गिरे थे। उल्कापिंडों की इस बारिश के बाद ये तत्व चांद पर तो वे वैसे ही पड़े रहे लेकिन धरती की आंतरिक गतिविधियों के कारण वे उसमें समाहित हो गए। इस विचार को 'लेट वेनीर हाइपोथेसिस' कहा गया और यह ग्रहीय विज्ञान का एक मूलभूत सिद्धांत बन गया।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
इसके दो साल बाद विलबोल्ट और ब्रिस्टल और ऑक्सफोर्ड यूनिर्वसिटी की एक टीम ने ग्रीनलैंड के कुछ चट्टानों का परीक्षण किया। ये चट्टान करीब 60 करोड़ साल पहले हुई उल्कापिंडीय गतिविधि के बाद धरती के मूल आवरण में थे। टीम ने इस 4.4 अरब साल पुराने चट्टानों में सोने की मौजूदगी नहीं पाई, लेकिन उसमें टंगस्टन था। टंगस्टन और सोना में कुछ समानता होती है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ग्रीनलैंड के चट्टान उल्कापिंडों की बारिश से पहले धरती के बाहरी परत में उपलब्ध तत्वों को बताते हैं। धरती पर उल्कापिंडों की बारिश करीब 4.4 अरब से 3.8 अरब साल पहले हुई थी।
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चंद्रमा की सतह - फोटो : Social media
विलबोल्ड के प्रभाव वाला यह अध्ययन सितंबर 2011 में नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ जिसमें 1970 के दशक में धरती और चांद पर ज्वालामुखी विस्फोट के कारण बने चट्टानों में सोना और रेडियम की उपलब्ध विभिन्न मात्रा की व्याख्या करता है, लेकिन उनकी यह परिकल्पना बदल गई। पिछले साल मैरीलैंड विश्वविद्याल की एक टीम और मथिऊ तॉबॉल ने रूस के कुछ चट्टानों का परीक्षण किया। ये चट्टान ग्रीनलैंड के चट्टान से युवा थे। केवल 2.8 अरब साल पुराना। परीक्षण में पाया गया कि इन चट्टानों में सोना सहित लौह अयस्क से चुड़े तमाम धातु थे।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अन्य वैज्ञानिकों का कहना है कि इस समय फिर से विचार करने की जरूरत है। फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के मुनीर हुमायून का कहना है कि यह काफी हसीन लगता है लेकिन आंकड़ों में काफी अंतर है। उनका कहना है कि 1970 के दशक में चांद और धरती के चट्टानों के अध्ययन से शानदार नतीजे निकले और 1990 के दशक में इस बारे में और अध्ययन किए गए।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
सोने की उत्पति के बारे में कुछ वैज्ञानिकों की राय भले ही अलग हो, लेकिन विलबोल्ड के मुताबिक अधिकतर वैज्ञानिक ग्रीनलैंड की पहाड़ियों पर किए गए शोध को आज भी सबसे विश्वसनीय मान रहे हैं। उन्होंने कहा कि हुमायुन की तरह कई वैज्ञानिकों ने भी इस तर्क को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। उन्होंने कहा, 'आप कभी भी पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो सकते, लेकिन हमारे मॉडल की खूबसूरती यह है कि इसमें सभी आंकड़े बेहतरीन तरीके से मिल रहे हैं।' उनके आइसोटोप के माप से पता चलता है कि धरती के भार का 0.5 फीसदी हिस्सा उल्कापिंडों की बारिश से बना है।
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