हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा रहस्य उजागर किया है, जो बताता है कि आर्कटिक की गर्मियां सिर्फ बर्फ को पिघलाती ही नहीं, बल्कि आसमान में बनने वाले बादलों को भी प्रभावित करती हैं।
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आर्कटिक में छिपी है अनोखी ‘क्लाउड फैक्ट्री’!
- फोटो : AI
Arctic Melting Ice: आर्कटिक का नाम सुनते ही दिमाग में बर्फ से ढकी सफेद दुनिया की तस्वीर उभरती है, लेकिन यह ठंडा इलाका अपने भीतर कई ऐसे राज छुपाए हुए है, जो विज्ञान की दुनिया को लगातार चौंका रहे हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा रहस्य उजागर किया है, जो बताता है कि यहां की गर्मियां सिर्फ बर्फ को पिघलाती ही नहीं, बल्कि आसमान में बनने वाले बादलों को भी प्रभावित करती हैं।
जब पिघलती बर्फ बन जाती है ‘बादल बनाने वाली मशीन’
शोधकर्ताओं के अनुसार, जैसे ही आर्कटिक की समुद्री बर्फ पिघलने लगती है, उसकी सतह पर छोटे-छोटे उथले जलाशय बन जाते हैं। देखने में साधारण लगने वाले ये पानी के तालाब असल में एक खास प्रक्रिया की शुरुआत करते हैं। ये हवा में बेहद सूक्ष्म कण छोड़ते हैं, जिन्हें “आइस-न्यूक्लियेटिंग पार्टिकल्स” कहा जाता है। यही कण बादलों में बर्फ के क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया को ट्रिगर करते हैं।
बादल बनने की पहेली
दरअसल बादल बनने के लिए हवा में मौजूद जलवाष्प को किसी ठोस सतह की जरूरत होती है, जिस पर वह जम सके। यही काम ये सूक्ष्म कण करते हैं। अगर ये कण न हों, तो बादलों का निर्माण या तो अलग तरीके से होगा या कई बार हो ही नहीं पाएगा। यानी ये छोटे-छोटे कण बादलों के अस्तित्व में अहम भूमिका निभाते हैं।
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आर्कटिक में बादलों का अलग ही खेल
- फोटो : adobestock
आर्कटिक में बादलों का अलग ही खेल
दिलचस्प बात यह है कि ये कण सिर्फ धूल या समुद्री लहरों से ही नहीं आते, बल्कि आर्कटिक में इनका एक जीवित स्रोत भी है। बर्फ और पानी में मौजूद सूक्ष्मजीव और बैक्टीरिया भी हवा में पहुंचकर बादलों के बनने की प्रक्रिया को शुरू कर सकते हैं। यह पहलू वैज्ञानिकों के लिए खासा रोमांचक और हैरान करने वाला है।
क्यों जरूरी हैं ये बादल?
आर्कटिक के बादल वहां की जलवायु को संतुलित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। वे तय करते हैं कि सूरज की कितनी रोशनी वापस अंतरिक्ष में जाएगी और कितनी गर्मी धरती के पास बनी रहेगी। आर्कटिक दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में तेजी से गर्म हो रहा है, इसलिए यहां बादलों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
अभी बाकी है कई सवालों के जवाब
इस अध्ययन से जुड़ी वैज्ञानिकों का मानना है कि बादलों और हवा में मौजूद कणों के बीच की जटिल प्रक्रिया को पूरी तरह समझना अभी बाकी है। खासकर यह जानना जरूरी है कि ये कण पिघले हुए पानी से हवा में कैसे पहुंचते हैं और किस तरह तापमान पर बर्फ बनने की प्रक्रिया शुरू करते हैं।
यह शोध कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी की टीम ने किया है, जिसके लिए नमूने ‘MOSAiC Expedition’ के दौरान जुटाए गए थे—एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय अभियान जिसमें 20 देशों के वैज्ञानिकों ने मिलकर काम किया। यह अध्ययन ‘Geophysical Research Letters’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जो इस रहस्य को और गहराई से समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।