Bihar News: सोमवार रात होलिका दहन हो गया। आज (मंगलवार) चंद्रगहण-सूतक से पहले बिहार में दूसरे तरह की होली चल रही है। फिर बुधवार सुबह से लेकर परसों तक अलग-अलग तरह की परंपराओं की होली खेली जाएगी। फगुआ तो सरस्वती पूजा से बज रहा।
मथुरा के बरसाने की लट्ठमार और वृंदावन की फूलों की होली तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसे देखने देश-विदेश से लोग आया करते हैं, लेकिन होली के मामले में बिहार भी पीछे नहीं है। यहां की होली भी रंग-बिरंगी है और रूप अनेक हैं। मतलब, बिहार के अलग-अलग इलाकों में होली कई अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। होली के त्योहार की शुरुआत इस बार 02 मार्च की रात होलिका दहन से हो चुकी है। आज गांव-देहात में धुरखेली जैसी परंपरा के तहत धूल-कीचड़ से होली की शुरुआत हो चुकी है। इस एक स्टोरी में जानिए, होलिका दहन और होली से बिहार में कहां-कैसे संस्कृति को जिंदा रखे हुए है। इसके साथ ही फगुआ या फाग कैसे रंग जमाता है, वह भी पढ़िए।
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होलिका दहन
- फोटो : अमर उजाला
होलिका दहन के पहले गांवों में गोइठा मांगने की रही है परंपरा
बिहार के गांवों में होली के आगमन के पहले होलिका दहन करने के लिए घर-घर से चंदा के रूप में गोइठा मांगने की प्राचीन परंपरा रही है। इस परंपरा के तहत युवाओं, खासकर बच्चों की टोली अपने-अपने गांव में बोरियां लेकर घूमती और हर घर जाकर चंदा के रूप में गोइठा मांगती रही है। इस दौरान बच्चे और युवा, "अगजा गोसाईं गोड़ लागे ली, घूम-घूम के गोइठवां मांगे ली" का यह गीत गाते गांव में फिरते हैं। जैसे ही वे किसी के घर पर गोइठा मांगने पहुंचते हैं, तो उनका दूसरा गीत शुरू होता है। घर की मालकिन महिला को संबोधित करते हुए वे गाते हैं, "ए जजमानी तोरा सोने के केवाड़ी, दू (चार, पांच, दस की संख्या) गोइठा दा"। इसके बाद उस घर से गोइठा मिलने के बाद रुख अगले घर की ओर और गीत के वही बोल। यह सिलसिला होलिका दहन का दिन आने तक चलता रहता था। बच्चे और युवक चंदे में मिले गोइठों को अपने गांव में एक स्थान पर जमा करते हैं। इसके बाद जमा किए गए गोइठा होलिका दहन में जलाए जाते हैं। हालांकि, कई गांवों में होलिका दहन के लिए गोइठा मांगने की यह परंपरा अब लुप्त होती जा रही है।
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होलिका की परिक्रमा करने की समृद्ध परंपरा रही है।
- फोटो : Samvad
दरभंगा में डंफा की थाप पर होलिका दहन परिक्रमा की परंपरा
दरभंगा के ग्रामीण इलाकों में डंफा (एक तरह का ढोल) की थाप पर पारंपरिक होली गीतों के गायन के साथ जलती हुई होलिका की परिक्रमा करने की समृद्ध परंपरा रही है। हालांकि, यह परंपरा अब धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। कुछ गांवों में ही इस परंपरा का निर्वहन हो रहा है।
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गांवों में फगुआ (फाग) गायन की समृद्ध परंपरा रही है।
फगुआ (फाग) गायन अब गांव से शहरों तक पहुंचा हुआ है
होली के आगमन के पहले बसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) के दिन से बिहार में फगुआ (फाग) गायन की समृद्ध परंपरा रही है। यह परंपरा आज भी जीवित है। इसके तहत गांवों में सार्वजनिक स्थान पर और शहरी इलाकों में देवी-देवताओं के मंदिरों के परिसर में फगुआ गाए जाते हैं। फगुआ गायन बसंत पंचमी से शुरू होकर होली तक चलता है। इस दौरान लोग राम-सीता, कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती, विष्णु-लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं के होली खेलने के गीत गाते हैं। होली के दिन फाग गायन के समाप्त होने के बाद चैत्र (चैत) माह के शुरू होने के साथ ही चैता गायन शुरू होता है, जो रामनवमी तक चलता है। इस दौरान "चैत मासे लिहले जनमवा हो रामा चैत मासे..." आदि पारंपरिक लोकगीत उमंग के साथ गाए जाते हैं।
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बिहार में होली।
- फोटो : अमर उजाला
होली की गंदी परंपराएं भी बिहार में चल रही
बिहार में होली के साथ कुछ गंदी परंपराएं भी चली आ रही हैं। इनमें हंड़िया टांगने और कीचड़ वाली होली शामिल है। हंड़िया टांगने वाली परंपरा पूरी तरह शरारत से भरी है। इस परंपरा में गांवों में शरारती किस्म के युवक मिट्टी की हांडी की गर्दन में रस्सी बांधते हैं और हांडी में मल-मूत्र, गंदगी या कीचड़ भर कर रात में किसी घर के मुख्य दरवाजे पर टांग देते हैं। साथ ही दरवाजे पर कीचड़, गंदगी या मल-मूत्र बिखेर देते हैं। यहां तक कि किसी छोटे जानवर का मृत शरीर भी घर के दरवाजे पर टांग देते हैं। सुबह होते ही घर का मालिक या परिवार का कोई सदस्य जैसे ही दरवाजा खोलता है, वह हंड़िया से टकरा जाता है और सारी गंदगी उस पर गिर जाती है तथा पैर भी दरवाजे पर गिराई गई गंदगी से सन जाते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसा जिस घर के साथ होगा, उस घर के लोग ऐसा करने वालों को गालियां देंगे; और ऐसा करने वाले लोग भी उसी टोले-मुहल्ले के होते हैं, जो गालियां सुनकर खुद मजे लेते हैं तथा उन्हें और गाली देने के लिए प्रेरित भी किया करते हैं। गांवों में शरारती किस्म के युवक हंड़िया टांगने वाला काम बहुधा उन्हीं घरों पर करते हैं, जिस घर के लोग चिढ़ने और गुस्सा करने वाले होते हैं। होली की दूसरी गंदी और गलत परंपरा कीचड़ तथा गंदगी वाली होली है। इस होली में लोग नाली के कीचड़, गोबर, मिट्टी, मल-मूत्र से होली खेलते हैं। इस तरह की होली झगड़े का भी सबब बन जाती है। सुखद बात यह है कि सभ्यता के विकास के दौर में होली से जुड़ी ये गलत परंपराएं अब समाप्त हो रही हैं।
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बिहार में होली।
- फोटो : अमर उजाला
भागलपुर की भस्म होली में महादेव के भक्त जुटते हैं
बिहार में भागलपुर की भस्म होली काफी प्रसिद्ध है। हालांकि, भस्म होली उत्तर प्रदेश में वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर भी खेली जाती है, लेकिन अंतर इतना है कि वहां चिता की राख (भस्म) से होली खेली जाती है और भागलपुर में सामान्य राख (भस्म) से अनूठे तरीके से खेली जाती है। भस्म से होली खेलने के साथ ही लोग रंगों से भी होली खेलते हैं। भस्म की होली में महादेव की भक्त जुटते हैं, हालांकि राख सामान्य ही रहती है।
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होली।
दरभंगा की शाही होली कैसी होती है?
दरभंगा में शाही अंदाज में होली खेली जाती है। इस होली में पारंपरिक वैभव दिखता है। यह होली पुराने दरभंगा राज की पारंपरिक शान का प्रतीक है। इस होली में मिथिला संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिलती है। राजमहल के आंगन में कलाकारों, गायकों और नर्तकियों के बीच अबीर-गुलाल की बौछार, ढोल-नगाड़ों की गूंज तथा भव्य भोज के साथ यह होली खेली जाती रही है। दरभंगा महाराज के समय में यह होली एक शाही जलसे के रूप में मनाई जाती थी, जहां नवाबी शान का रंग देखने को मिलता था। इस दौरान शाही दरबार में पारंपरिक मिथिला लोकगीत, नृत्य और ढोल-नगाड़ों के साथ होली का उत्साह चरम पर होता था। राजमहल के आंगन में भव्य रंगोत्सव होता था और हर आम-खास के लिए विशेष भोज का आयोजन होता था। यह होली मिथिला की साझी संस्कृति की प्रतीक थी, जिसमें स्थानीय लोग राजशाही परिवार के साथ होली का आनंद लेते थे। वर्तमान समय में यह दरबारी भव्यता कम हुई है, लेकिन मिथिला के पारंपरिक फाग (होली) गीतों के साथ होली का उल्लास आज भी दरभंगा और आसपास के क्षेत्रों में जीवंत दिखता है।
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होली 2026
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सहरसा के बनगांव की घमौर होली है खास
सहरसा जिले के पश्चिम कहरा प्रखंड के बनगांव की घमौर होली की अपनी अलग विशिष्ट पहचान है। यहां की होली ब्रज की होली जैसी ही बेमिसाल है। इस होली की खास बात यह है कि यह होली के एक दिन पहले ही मनाई जाती है। इस होली में लोग एक-दूसरे के कंधे पर सवार होकर जोर आजमाइश करते नजर आते हैं। मान्यता है कि यहां घमौर होली की परंपरा भगवान श्री कृष्ण के काल से ही चली आ रही है। बनगांव में घमौर होली की शुरुआत 18वीं सदी में यहां के प्रसिद्ध संत लक्ष्मी नाथ गोसाईं बाबाजी ने की थी। बनगांव बिहार की सबसे बड़ी आबादी और तीन पंचायतों वाला गांव है और यहां की होली की देश में अलग ही सांस्कृतिक पहचान है। इस गांव के लोग चाहे कहीं भी बसे हों, वे होली पर अपने गांव आते ही हैं और यहां के ग्रामीण घमौर होली का आनंद लेते हैं। इस होली में शामिल होने यदि गांव का कोई नामी-गिरामी व्यक्ति नहीं आता, तो उसकी अर्थी निकाली जाती है। यहां की होली सामाजिक समरसता और भाईचारे की मिसाल भी है। यहां सभी जाति-धर्म के लोग भगवती स्थान में मिलजुल कर होली मनाते हैं और आपस में कोई भेदभाव नहीं रहता।
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बनगांव की होली की चर्चा देश भर में होती है।
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यहां पर मंदिर के चारों ओर घूम-घूम कर फाग गाते हैं लोग
बनगांव में लोग जब तक भगवती स्थान में होली नहीं मना लेते, तब तक उनकी होली अधूरी मानी जाती है। यह होली गांव की विभिन्न गलियों से होकर भगवती स्थान पहुंचती है, और मंदिर के चारों ओर घूम-घूम कर फाग गाते हैं। इसके अलावा सहरसा के अन्य इलाकों में भी देवी मंदिर के चारों ओर घूम-घूम कर ढोल-मंजीरे के साथ यह होली खेली जाती है। माना जाता है कि रंगों से सराबोर होकर मंदिर की घूम-घूम कर परिक्रमा करते हुए होली खेले जाने के कारण ही यहां की होली का नाम घूमोर या घमौर होली पड़ा है। यह भी माना जाता है कि बाबा लक्ष्मीनाथ की कृपा से यहां का इतिहास है कि घूमोर होली पर आज तक कोई अप्रिय घटना नहीं घटी है। इसीलिए गांव के सभी लोग बाबा लक्ष्मीनाथ के शरणागत रहते हैं। प्राचीनता को लेकर ही यहां की होली को राजकीय होली का दर्जा दे दिया गया है। राजकीय होली महोत्सव के रूप में यहां पिछले कई वर्ष से बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग तथा सहरसा जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय बनगांव होली महोत्सव का आयोजन हो रहा है।
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राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद होली में खूब चर्चा में रहते थे।
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कुर्ता फाड़ होली की पहचान लालू प्रसाद यादव से
बिहार में कुर्ता फाड़ होली भी काफी प्रचलित है। इस होली में रंगों से सराबोर होने के बाद एक-दूसरे का कुर्ता भी फाड़ देते हैं। कुर्ता फाड़ने की वजह से ही इसका नाम कुर्ता फाड़ होली पड़ा है। हालांकि, कुर्ता फाड़ होली खेलने के दौरान शरारती किस्म के लोग अधोवस्त्र भी फाड़ डालते हैं, जिससे नंगा हो जाने से उस व्यक्ति की स्थिति विचित्र सी हो जाती है। बिहार की राजधानी पटना स्थित लालू-राबड़ी आवास पर होने वाली कुर्ता फाड़ होली से तो हर बिहारवासी परिचित है।
बिहार में फूलों वाली होली की नई परंपरा शुरू हुई है।
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फूलों वाली होली अब शहरों में पहचान बना चुकी
होली पर प्राचीनता के साथ नवीनता का भी प्रयोग हुआ है। इसी प्रयोग के तहत वृंदावन की फूलों की होली की नकल करते हुए गया और पटना जैसे शहरों में फूलों से भी होली खेलने की नई परंपरा शुरू हुई है। इसका चलन भी बढ़ा है। इस होली में हुड़दंग तो होता है, पर सादगी भी होती है। लोग एक-दूसरे पर फूलों की पंखुड़ियां फेंक कर होली मनाते हैं।
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बिहार में होली।
- फोटो : अमर उजाला
अबीर-गुलाल वाली होली शाम में शालीनता की पहचान
बिहार की होली में नवीन प्रयोग के रूप में प्राकृतिक वस्तुओं से बने अबीर-गुलाल से होली खेलने की शुरुआत हो चुकी है। प्राकृतिक वस्तुओं से बने अबीर-गुलाल से होली खेलने का शरीर की त्वचा पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है। यही वजह है कि संभ्रांत लोग इस तरह की होली को बढ़ावा दे रहे हैं। हालांकि, अभी भी केमिकल और त्वचा को चुभने वाले अन्य पदार्थों से बनने वाले अबीर-गुलाल प्रयोग में हैं, जिनका जागरूकता आने से प्रयोग धीरे-धीरे कम हो रहा है।
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बिहार में होली।
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पटना आसपास में बसिऔरा होली भी कुछ अलग
बसिऔरा होली या होली-बसिऔरा बिहार की राजधानी पटना से सटे दानापुर और आसपास के इलाकों तथा पटना सिटी के इलाके में प्रचलित है। यह होली के अगले दिन मनाया जाता है। जैसे आम बोलचाल में एक दिन पुराने किसी खाद्य पदार्थ को बासी कहा जाता है, इसी तर्ज पर होली खत्म होने के अगले दिन या कहें कि होली के बासी हो जाने के दिन यह होली मनाई जाती है। माना जा सकता है कि बासी से जोड़ कर ही इसका नाम बसिऔरा होली या होली-बसिऔरा पड़ा है। इस दिन इन इलाकों में फिर से होली का जश्न मनता है। रंगों से भरे ड्रम खुले वाहनों पर रखकर जुलूस निकलता है। वाहनों पर रखे साउंड सिस्टम से होली गीत बजाए जाते हैं और रंग भरे ड्रम से पिचकारी में रंग भरकर वाहनों पर सवार युवाओं की टोली लोगों को रंगों से सराबोर करती है।
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होली
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झूमटा के नाम पर आज भी घूमती है बैलगाड़ियां
मगध के इलाके, खासकर औरंगाबाद और अरवल के कई क्षेत्रों में झूमटा की भी पुरानी परंपरा चली आ रही है। झूमटा होली के अगले दिन ही मनाया जाता है। यह पटना वाले बसिऔरा होली या होली-बसिऔरा से मिलता-जुलता है। इस दिन भी लोग होली का जश्न मनाते हैं। रंगों की बौछार होती है। पुराने समय में झूमटा जुलूस के शक्ल में बैलगाड़ियों पर निकाला जाता था। बैलगाड़ियों पर रंगों से भरे ड्रम रखे जाते थे और रंगों से भरे ड्रम से पिचकारी में रंग भरकर बैलगाड़ी पर सवार युवक लोगों को रंगों से सराबोर किया करते थे। हालांकि, अब बैलगाड़ियों की जगह ट्रैक्टरों और खुले पिकअप वैन ने ले ली है। इन्हीं वाहनों पर रंगों से भरे ड्रम रखे जाते हैं, जिन्हें पिचकारी में भरकर वाहनों पर सवार युवाओं की टोली लोगों को रंगों से सराबोर किया करती है। वाहनों के साथ ढोल, झाल-मंजीरा बजाते होली गीत गाने वालों की टोली भी साथ चलती है। होली के पारंपरिक गीतों के साथ कहीं-कहीं लोग फूहड़ गीत भी गाते दिखते हैं।
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बिहार के औरंगाबाद में खास तरह से खेली जाती है होली।
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औरंगाबाद के कारा की बुढ़वा होली या बुढ़वा मंगला
बिहार में औरंगाबाद के ओबरा प्रखंड के कारा की "बुढ़वा मंगल (मंगला) या बुढ़वा होली" भी काफी चर्चित है। जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि यह होली बूढ़ों यानी वृद्धों की होली है। यहां बुढ़वा मंगल होली की कब, कैसे और क्यों शुरुआत हुई, इसका तो कोई ज्ञात इतिहास नहीं है, लेकिन इतना तो तय है कि यह होली भी बेहद पुरानी है और इसकी शुरुआत बुजुर्गों ने की है। इसे होली के समाप्त होने के बाद आने वाले मंगलवार को मनाया जाता है। इसी कारण, मंगलवार को बूढ़ों द्वारा मनाए जाने के कारण इसका नाम "बुढ़वा मंगल या बुढ़वा होली" पड़ा। बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई इस होली में पहले सिर्फ बूढ़े ही शामिल होते थे, लेकिन अब इसमें बुजुर्गों के साथ युवा और बच्चे भी शामिल होने लगे हैं।
मटकाफोड़ होली की चर्चा भी खूब होती है।
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जहानाबाद की महिलाओं की मटका फोड़ होली
आमतौर पर तो मुंबई की तर्ज पर बिहार में भी मटका फोड़ होली होने लगी है, लेकिन जहानाबाद की मटका फोड़ होली कुछ अलग है। वजह यह कि आमतौर पर मटका फोड़ होली में पुरुष ही भाग लेते हैं; वहीं जहानाबाद में निषादों के टोले में होने वाली मटका फोड़ होली में सिर्फ महिलाएं ही भाग लेती हैं। सक्षम महिलाएं, युवतियां और किशोरियां मलखंभ के खेल की तर्ज पर एक-दूसरे पर समूह में पिरामिड बनाती हुई सवार होकर 30-40 फीट की ऊंचाई पर टंगे मटके तक पहुंचती हैं और उसे मुक्के से मारकर या सिर से प्रहार कर फोड़ती हैं। जहानाबाद में यह परंपरा पिछले कुछ वर्षों से ही शुरू हुई है। यहां मटका फोड़ने वाले समूह की विजेता टीम को आयोजकों द्वारा नकद इनाम भी दिए जाते हैं।