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Bihar: शिक्षा का मंदिर या मजबूरी का घर? नालंदा में एक छत के नीचे चल रहे दो स्कूल, बच्चों के भविष्य से खिलवाड़

Sat, 28 Sep 2024 04:43 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नालंदा

सार

Nalanda News: Bihar: शिक्षा का मंदिर या मजबूरी का घर? नालंदा में एक छत के नीचे चल रहे दो स्कूल, बच्चों के भविष्य से खिलवाड़
Bihar News: Two schools running under one roof in Nalanda, how will future of children be made
 
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स्कूल में नजर आई शिक्षा की दुर्व्यवस्था - फोटो : अमर उजाला
नालंदा जिले की शिक्षा व्यवस्था की दयनीय स्थिति ने एक बार फिर राज्य सरकार और शिक्षा विभाग की नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रहुई प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय दौलतपुर की यह कहानी न केवल शिक्षा व्यवस्था की बदहाली का उदाहरण है, बल्कि यह बच्चों के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ की गंभीर स्थिति को भी उजागर करती है।
 
एक छत के नीचे दो स्कूल
इस विद्यालय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक ही छोटी इमारत में दो अलग-अलग स्कूलों का संचालन हो रहा है। 2013 से चली आ रही इस व्यवस्था के तहत, एक ओर उत्क्रमित मध्य विद्यालय दौलतपुर के छात्र पढ़ाई करते हैं। वहीं, दूसरी ओर उसी इमारत के दूसरे कमरे में प्राथमिक विद्यालय रघुनाथपुर के बच्चे शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं। यह समायोजन न केवल छात्रों बल्कि शिक्षकों के लिए भी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
 
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स्कूल में नजर आई शिक्षा की दुर्व्यवस्था - फोटो : अमर उजाला
विद्यार्थियों को हो रही यह परेशानी
विद्यालय में नामांकित 90 बच्चों को जगह की कमी और संसाधनों की अत्यधिक कमी का सामना करना पड़ रहा है। सिपरामणि नाम की एक छात्रा ने बताया कि जगह की कमी के कारण तीन से चार कक्षाओं के बच्चों को एक साथ पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, अगर आठवीं कक्षा चल रही है, तो छठी और सातवीं कक्षा के बच्चे केवल बैठे रहते हैं। इससे न केवल बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, बल्कि उनके मनोवैज्ञानिक और शारीरिक विकास पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है।
 
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स्कूल में नजर आई शिक्षा की दुर्व्यवस्था - फोटो : अमर उजाला
बरसात में हालात और भी बदतर
बरसात के मौसम में स्थिति और भी विकट हो जाती है। जब बरामदे में बैठने वाले बच्चों को भी उन्हीं कमरों में समायोजित किया जाता है, तो स्कूल की संकुलता और बदहाली और बढ़ जाती है। शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया को अनिवार्य सुविधाओं की कमी के कारण गंभीर अवरोधों का सामना करना पड़ता है।
 

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स्कूल में नजर आई शिक्षा की दुर्व्यवस्था - फोटो : अमर उजाला
स्कूल प्रबंधन की चिंता
स्कूल के प्रिंसिपल सुधीर प्रसाद ने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि हमारे पास न तो पर्याप्त कमरे हैं, न ही बच्चों के लिए बेंच-डेस्क और न ही शिक्षकों के बैठने की उचित व्यवस्था। इतना ही नहीं, मिड-डे मील की सामग्री भी हमें इन्हीं दो कमरों में सुरक्षित रखनी पड़ती है। इन समस्याओं के बावजूद, स्कूल प्रशासन बिना किसी सहारे के इस चुनौतीपूर्ण स्थिति से निपटने की कोशिश कर रहा है।
 
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स्कूल में नजर आई शिक्षा की दुर्व्यवस्था - फोटो : अमर उजाला
प्रशासन की उदासीनता
जब इस गंभीर मामले पर जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) राजकुमार से संपर्क किया गया, तो उन्होंने चौंकाने वाली प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्हें इस स्थिति की जानकारी नहीं थी और मामले की जांच की जा रही है। यह बयान प्रशासन की उदासीनता को दर्शाता है, जो ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों की दुर्दशा और बुनियादी सुविधाओं की कमी की अनदेखी कर रहा है।
 
यह स्थिति केवल नालंदा जिले के इस स्कूल की नहीं है, बल्कि बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में सरकारी विद्यालयों का यही हाल है। शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने और बच्चों के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार और प्रशासन को तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले स्कूल, अगर मजबूरी का घर बन जाएंगे, तो न केवल बच्चों का भविष्य अंधकारमय होगा, बल्कि समाज का भी विकास बाधित होगा।

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