दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग और बिक्री के बावजूद, पेट्रोल और डीजल की वैश्विक मांग में गिरावट नहीं हो रही है। मॉर्गन स्टेनली के एक अध्ययन से यह जानकारी मिली है। अध्ययन में दावा किया गया है कि इलेक्ट्रिक वाहन खरीद में बढ़ोतरी और तेल की बढ़ती मांग के बीच का विरोधाभास दुनिया भर में पारंपरिक उम्मीदों को चुनौती दे रहा है।
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petrol pump
- फोटो : Pixabay
रिपोर्ट में कहा गया है कि पेट्रोल और डीजल के लिए वैश्विक खपत 2023 में अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंचने वाली है। जिसमें जीवाश्म ईंधन की बिक्री लगभग 40 प्रतिशत बढ़ जाएगी। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन की बिक्री बढ़ने के बावजूद, दुनिया भर में पेट्रोल और डीजल की खपत पर अंकुश नहीं लगा है। ईवी के वैश्विक ऑटोमोबाइल बिक्री का 10 प्रतिशत से ज्यादा होने की उम्मीद है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : iStock
अध्ययन से आगे पता चला कि नॉर्वे विश्व स्तर पर सबसे ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन प्रवेश दर का दावा करता है। उत्तरी यूरोपीय देश में नए यात्री वाहनों की बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत होने के बावजूद, नॉर्वे में तेल की मांग में गिरावट नहीं आई है। ऐसा ही ट्रेंड चीन में भी देखा गया है, जो दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन बाजार है। अध्ययन से पता चला है कि चीन में तेल की मांग 50 प्रतिशत बढ़ गई है और देश में ईवी की पहुंच 20 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है। इसने अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के एक अनुमान का हवाला दिया है जिसमें कहा गया है कि पेट्रोकेमिकल क्षेत्र भविष्य में तेल की मांग का प्राथमिक चालक होगा।
अध्ययन में यह भी कहा गया है कि नई ऊर्जा में बदलाव होने में दशकों लग जाते हैं। नई टेक्नोलॉजी को दबदबा कायम करने में समय लगता है। इस समय, परिवहन क्षेत्र में प्राथमिक ऊर्जा खपत में पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से ज्यादा है। जबकि सौर और पवन की हिस्सेदारी सिर्फ पांच प्रतिशत से ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में शुद्ध-शून्य उत्सर्जन की ओर बदलाव को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियां और लागत-कुशल नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने से इस संतुलन में धीरे-धीरे बदलाव आएगा।