पितरों की आत्मा की शांति
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वायु पुराण
ब्रह्मा जी ने कहा- श्राद्धं कुर्वीत धर्मेण, अनश्राद्धं कुलं नश्यति।
अर्थात जो कुल श्राद्ध नहीं करता, वह धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है। इसमें बताया गया है कि ‘श्राद्ध वंश वृद्धि का आधार है।’
कूर्म पुराण
यहां अश्विन मास के कृष्ण पक्ष को श्राद्ध के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
मृतकों का सम्मान, जीवितों की जिम्मेदारी
उपनिषदों में पितरों को देवतुल्य माना गया है। श्राद्ध एक ऐसा वैदिक कृत्य है, जिसमें श्रद्धा, संकल्प और कृतज्ञता के साथ पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक कर्तव्य और भावनात्मक उत्तरदायित्व है।
श्राद्धं धर्मस्य मूलं स्मृतम्।
अर्थात- श्राद्ध धर्म का मूल है।
गरुड़ पुराण के पूर्व खंड में भगवान विष्णु स्वयं गरुड़ जी को श्राद्ध की महिमा बताते हुए कहते हैं कि “जो व्यक्ति श्रद्धा और विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, उसके पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं और परिवार में लक्ष्मी और पुण्य की वृद्धि होती है।”
पितरों की आत्मा को गति
आधुनिक विज्ञान और मनोविज्ञान भी मानते हैं कि कृतज्ञता और पूर्वज-स्मरण से मानसिक संतुलन, पारिवारिक एकता और सामाजिक मूल्यों की वृद्धि होती है। गरुड़ पुराण हो या मनु स्मृति, सभी शास्त्र एक स्वर में कहते हैं कि श्राद्ध पितरों की आत्मा को गति देता है और वंश की रक्षा करता है। यह न केवल मृतकों का सम्मान नहीं, जीवितों की जिम्मेदारी भी है।