सनातन धर्म में मानव जीवन को केवल व्यक्तिगत कर्मों का परिणाम नहीं माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्म के साथ ही व्यक्ति पर अपने माता-पिता, पूर्वजों, देवी-देवताओं, ऋषियों और समाज के प्रति कुछ जिम्मेदारियां आ जाती हैं। इन्हीं दायित्वों को पांच ऋणों के रूप में बताया गया है। इन्हें मातृ ऋण, पितृ ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण और मनुष्य ऋण कहा जाता है। मान्यता है कि इन ऋणों को अपने कर्तव्यों और सद्कर्मों के माध्यम से निभाने से जीवन में संतुलन और सुख-शांति बनी रहती है।
1. मातृ ऋण
मातृ ऋण का संबंध मां और उनके मातृ पक्ष से माना जाता है। इसमें नाना-नानी, मामा-मामी, मौसा-मौसी तथा मातृ वंश के पूर्वजों को भी शामिल किया जाता है। मां को जीवनदात्री मानकर उनके प्रति सम्मान और सेवा करना इस ऋण को निभाने का प्रमुख माध्यम बताया गया है। माता को कष्ट न देना, उनकी जरूरतों का ध्यान रखना और मातृ पक्ष के प्रति सम्मान बनाए रखना इस ऋण को चुकाने का तरीका माना जाता है।