फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्रिकेट के खेल से भी ज्यादा रोमांचक हैं ये खुलासे

विज्ञापन
विज्ञापन
जिस देश में क्रिकेट को एक धर्म माना जाता है। जहां क्रिकेटरों की पूजा की जाती हो। ये एक खेल ना होकर एक जूनून है जिसके आगे क्या अमीर क्या गरीब सारी दीवारें टूट जाती हैं। लेकिन क्रिकेट के जिस रूप को आप देख रहे हैं क्या वाकई ये पहले भी ऐसा ही था।
विज्ञापन


आखिर जिस खेल के सामने पूरा देश एक जुट नजर आता है। उसका पुराना चेहरा कैसा रहा होगा ? आज जिस तरह से ये खेल समृद्धि के शिखर पर है इसकी शुरूआत कब और कहां से हुई? कैसे इसने आधुनिक रूप लिया?

इस सब को समेटने की कोशिश मशहूर इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा ने की। उन्होंने अपनी नई किताब 'विदेशी खेल अपने मैदान पर' में क्रिकेट के प्राचीन इतिहास को एक जगह रखने की कोशिश की।
विज्ञापन


उन्होंने अपनी किताब में इंग्लैंड से लेकर इसके भारत पहुंचने और भारतीय क्रिकेट में एक सम्प्रदाय के रूप में स्थापित हो चुके क्रिकेट आंकने की कोशिश की है। उन्होंने अपनी किताब में भारतीय क्रिकेट के गुमनाम खिलाड़ियों को उबारने की कोशिश की है।

आईपीएल और बीसीसीआई की आलोचना

रामचंद्र गुहा ने क्रिकेट इतिहास पर लिखी अपनी नई पुस्तक में भारतीय क्रिकेट से जुड़ी कई ऐसी बातों को खुलासा किया है, जिस पर क्रिकेट के जानकार बोलने से बचने की कोशिश करते हैं। चाहे आईपीएल यानी इंडियन प्रीमियर लीग से जुड़ा मामला हो या फिर बीसीसीआई यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के मनमाने रवैये की फेहरिस्त हो। उन्होंने अपनी किताब में इनकी जमकर आलोचना की है।

गुहा ने लिखा है कि "एक भारतीय क्रिकेट प्रेमी के रूप में अपने देश के क्रिकेट बोर्ड का यह रवैया मुझे क्षुब्ध करता है। मुझे भारतीय क्रिकेट बोर्ड के घमंडी और मनमानी भरे फैसले, दूसरे देशों की क्रिकेट प्रेमी जनता के ऊपर अत्याचार लगते हैं। इसके अलावा देश के अंदर क्रिकेट में फैले भ्रष्टाचार और अपराधीकरण पर बोर्ड के निठल्ले रवैए पर मुझे झुंझलाहट भी होती है।"

उन्होंने बीसीसीआई के मजबूत होते जाने के बारे में शारदा उगरा के हवाले से लिखा है, "जिस देश ने सबसे पहले क्रिकेट में ब्रितानी एकाधिकारों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की इस समय वही क्रिकेट की दुनिया का बाहुबली बन चुका है। बेतहाशा दौलत लुटाना और किसी भी देश की बांह मरोड़ने के लिए तैयार रहना, यही उसकी असली पहचान बन चुके हैं। इन दिनों क्रिकेट की दुनिया के केंद्र में भारत है और उसे यहां का प्रतिनिधि बनने के बजाए बादशाह बनने का ज्यादा शौक है।"

1983 की लॉर्ड्स की जीत का अहम योगदान

रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक में साफ किया कि भारतीय क्रिकेट में आधुनिक चकाचौंध की शुरूआत 1983 में भारतीय टीम के लॉर्ड्स में मिली विश्व कप की जीत के बाद हुआ।

उनके मुताबिक, 1992 में पाकिस्तान और 2006 में श्रीलंका के विश्व विजेता बनने का भी अहम रोल देखने को मिला। जिसके बाद से दक्षिण एशिया क्रिकेट का केंद्र बनकर ऊभरा और धीरे-धीरे टी-20 क्रिकेट के आगाज के साथ ही आईपीएल की लोकप्रियता ने बीसीसीआई के हाथ लगभग क्रिकेट की सत्ता सौंप दी।

गुहा ने अपनी किताब में लिखा, "आईसीसी का मुख्यालय लॉर्डस से हट कर दुबई आ गया, ये भौगोलिक स्थानांतरण उसके पीछे मौजूद बड़े राजनैतिक और व्यावसायिक बदलावों का सूचक था। आईपीएल की सफलता ने क्रमश: इसके बाद आए दूसरे सबसे बड़े बदलाव की उद्घोषणा की।"

उन्होंने आगे लिखा, "बीसीसीआई ने अपनी ताकतों को पहचाना और नियमित रूप से इन ताकतों का इस्तेमाल किया हालांकि उसके तरीके हमेशा निष्पक्ष नहीं रहे। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बीसीसीआई ने भारत द्वारा खेले गए मैचों पर डीआरएस पद्धति (डिसीजश्न रिव्यू सिस्टम) लागू करने से इनकार कर दिया था जबकि सही मायने में दुनिया के सबसे अच्छे अंपायर भी गलती न करने का दावा नहीं कर सकते क्योंकि आखिरकार वह एक इंसान ही हैं और उनसे भी गलती होना स्वाभाविक है।"

इसके आगे गुहा ने लिखा, "यह सच है कि टीवी तकनीक के इस्तेमाल और गैर-इस्तेमाल के अधिकार, दौरों की समय-सारणी तैयार करना या न करना और क्रिकेट से जुड़े अनेकानेक मुद्दों पर बीसीसीआई का बिल्कुल मनमाना और एकछत्र राज चलता है।"

जब क्रिकेट में किया जाता था 'नस्ल' भेद

जहां एक ओर गुहा ने आईपीएल और बीसीसीआई के मनमाने रवैये पर सवाल खड़े किए। दूसरी ओर उन्होंने अपनी किताब के माध्यम से क्रिकेट में होने वाले भेदभाव को भी उजागर किया।

उन्होंने क्रिकेट में जाति, धर्म, नस्ल के आधार पर भेदभाव होने के कई उदाहरण पेश किए। वैसे भी क्रिकेट को अमीरों का खेल कहा जाता है। शायद इसीलिए भारतीय क्रिकेट में जो गिने चुने दलित खिलाड़ी रहे, वे भी गुमनाम ही रहे।

गुहा ने अपनी इस किताब के माध्यम से उन गुमनाम क्रिकेटरों के नाम सामने लाने की कोशिश की है। उन्होंने लिखा है कि एक बार मैं मुंबई में, दलित गेंदबाज रहे पालवंकर बालू के भतीजे से मिला, जिन्होंने कुछ अनमोल पारिवारिक दस्तावेज मुझे सौंपे। इसमें मराठी में छपा एक संस्मरण भी शामिल था। उन्होंने अपने चाचा और अपने पिता विट्ठल (बालू के छोटे भाई और एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज) की यादें भी साझा कीं।

इसके बाद तब के एक अग्रणी राष्ट्रवादी अखबार 'बॉम्बे क्रॉनिकल' की माइक्रो फिल्में देखते हुए मैंने दोनों भाइयों के निजी संघर्षों पर दिलचस्प सामग्री पाई। ये दोनों भाई अपने समय के अच्छे हिंदू क्रिकेटर थे, लेकिन दलित पृष्ठभूमि से होने के कारण उन्हें पर्याप्त स्वीकृति नहीं मिली। इसके बाद मैंने बीआर अंबेडकर के साथ बालू के करीबी और जटिल संबंध के बारे में नई और अब तक अनदेखी रिपोर्टें भी पाईं।

आखिरकार बालू इस किताब के केंद्रीय विषय बन गए। वे एक शानदार क्रिकेटर और एक उल्लेखनीय इंसान के रूप में प्रतीक बन जाने वाले भारत के पहले खिलाड़ी थे और 1910 से 1930 के बीच पश्चिमी भारत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण दलित हस्ती भी थे।

कई बेमिसाल क्रिकेटरों को नहीं मिला मौका

1947 के बाद शायद तीन या चार दलितों ने भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेला, लेकिन कोई भी ख्याति नहीं हासिल कर सका। मुझे यकीन है कि अब तक कोई आदिवासी या उत्तर-पूर्व से कोई भारत के लिए नहीं खेला है। भारतीय टीम में खेल प्रशंसकों में सभी वर्गों और धर्मों के लोग हैं, लेकिन शीर्ष खिलाड़ी व्यापक रूप से शहरों और ऊंची जातियों से आते हैं।

उन्होंने बताया कि मेरी किताब का उद्देश्य एक क्रिकेटीय इतिहास को समग्र रूप में पेश करना था। लेकिन मैं जितना अधिक शोध करता गया, उतना ही मैंने देखा कि चतुष्कोणीय तथा पंचकोणीय प्रतियोगिताएं राजनीति और समाज के साथ आपस में गुंथी हुई थी। इसलिए आखिर में मैंने एक ऐसी किताब लिखी, जिसमें नस्ल, धर्म, जाति और राष्ट्रवाद खुद क्रिकेट जितने ही महत्वपूर्ण थे। मैंने जो किताब लिखी है वह भारतीय क्रिकेट का सामाजिक और राजनीतिक इतिहास है, जिसे नस्ल, जाति, धर्म और राष्ट्र की 'प्रधान श्रेणियों' के जरिए लिखा गया है।

मुझे अच्छा लगेगा अगर कोई बालू और विट्ठल की अवधि के बीतने के बाद खेल पर राज करने वाली चौकड़ी की एक जीवनी लिखे। सीके नायडू, विजय मर्चेंट, विजय हजारे और वीनू मांकड़। ये सभी बेमिसाल क्रिकेटर थे, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर बहुत कम अवसर हासिल हुए। नायडू, वीरेंद्र सहवाग जैसी महारथ से गेंदबाजों की धुलाई कर सकते थे।

सांप्रदायिकता और क्रिकेट के बीच खिंची दीवार

रामचंद्र गुहा ने लिखा कि बंबई का वार्षिक क्रिकेट उत्सव, युद्ध की पृष्ठभूमि लिए खेल, धर्म और राजनीति का सम्मिश्रण था। इसका अस्तित्व एक विचित्र विरोधाभास था-एक कट्टर सांप्रदायिक प्रतियोगिता जो आधुनिक भारत के सबसे प्रगतिशील और महानगरीय शहर में परवान चढ़ी थी। कोई भी अब उनकी गहरी भावना को समझ सकता था जिन्होंने कड़वाहट से इसका विरोध किया था।

भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए, बरेलवी या तलेयारखान के लिए क्रिकेट मैदान पर सांप्रदायिक पहचान के ही स्वीकार ने साझी नागरिकता के विचार को भंग कर दिया था, जिस का अर्थ था कि 'और कुछ भी होने से पहले हम सभी भारतीय हैं।' पंचकोणीय क्रिकेट प्रतियोगिता के अस्तित्व ने समावेशी राष्ट्रवाद को अंगूठा दिखा दिया जिसका महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू जैसे लोगों ने समर्थन किया था, और जाति-धर्म के विभाजनों को बढ़ावा दिया। पहले यह बहस हुई कि प्रतियोगिता की शुरुआत ही ब्रितानी फूट डालो और राज करो की नीति के लिए थी और दूसरी दलील ये थी कि इसे जारी रखना पाकिस्तान की नाजायज परंतु खतरनाक रूप से फैशनेबल मांग को बढ़ावा देता था।

प्रशासकों ने जानबूझकर सांप्रदायिक आधार पर खेल के संगठन को प्रोत्साहित किया था ऐसा विस्तृत रूप से माना जाता था। स्वतंत्रता की पूर्व संध्या को भारत का दौरा कर रहे एक अमेरिकन पत्रकार ने लिखा कि ब्रितानी फूट डालो और राज करो की नीति विद्यालयों में भी पहुंच गई थी। खेल में हिंदू टीम मुस्लिम टीम से लड़ रही थी और स्नातक होने के साथ यह प्रतियोगिता नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा बन जाती थी।

ब्रिटिश अफसरों ने घोला जहर

स्वतंत्रता के फौरन बाद लिखे अपने एक लेख में पूना के जाने माने क्रिकेटर डीबी देवधर ने दावा किया कि भारत के उच्चतम क्रिकेट में सांप्रदायिकता की भावना सिर्फ ब्रिटिश अफसरों की ही वजह से आई क्योंकि शुरुआती दिनों में ये लोग भारतीयों से निपटते समय खुद को श्रेष्ठता की भावना से भरे रहते थे।

भारत में ब्रितानी साम्राज्य की रक्षा के लिए आने वाले सभी ब्रितानी अधिकारियों को उच्च अधिकारियों ने कह रखा था कि मूलवासियों के साथ वो बहुत कम संपर्क रखें। इसलिए अंग्रेज़ों ने बंबई, कलकत्ता और मद्रास के तीन प्रांतीय शहरों में खास क्लब बना लिए। बाद में इनकी देखा देखी पूना और बंगलुरू जैसे दूसरे शहरों में भी क्लबों की स्थापना की गई।

पारसी लोगों ने भी इस खेल को चुना और उन्होंने खेल के साथ साथ अंग्रेजों की पृथकतावादी प्रवृत्ति को भी ले लिया। एक तरफ अंग्रेज पारसियों को उनके पवित्र किलों में प्रवेश नहीं करने देते थे। इसलिए पारसियों ने विवशतापूर्वक अलग क्लब बना लिया। परंतु उन क्लबों में वे दूसरे भारतीयों को अनुमति दे सकते थे। दुर्भाग्यवश यह किया नहीं गया। परिणामस्वरूप हिंदुओं को भी वही रास्ता अपनाना पड़ा। और आखिर में मुसलमान भी यही रास्ता अपानने को बाध्य थे।

क्रिकेट के मैदान पर जातिवाद की कितनी जड़ें?

औपनिवेशिक क्लबों का जातिवाद साफ दिखता था। परंतु यह उद्धरण यह भी सुझाता है कि हिंदू सांप्रदायिक क्रिकेट में खुद शामिल होने के इच्छुक होने की बजाय पीड़ित व्यक्ति थे। जबकि वह एक पूर्वव्यापी सोच लगती थी जिस पर शायद 1920 से गांधी और उनके जैसों द्वारा प्रोत्साहित सम्मिलित राष्ट्रवाद का प्रभाव था।

यदि ब्रितानी अलग थे तो इसी प्रकार हिंदू समाज भी अपने धार्मिक दायरों के चलते जातियों और उप जातियों के बीच बंटा हुआ था। वास्तव में 19वीं शताब्दी के आखिर के भारत में क्रिकेट क्लबों ने खुद को जाति के आधार पर व्यवस्थित कर लिया था। शासकों ने शायद सोचा होगा कि चतुष्कोणीय क्रिकेट प्रतियोगिता का स्वरूप भारत के लिए स्वाभाविक होगा लेकिन वे इसे बिना सहायता के अस्तित्व में नहीं लेकर आ रहे थे।

सांप्रदायिक क्रिकेट में जितने हिंदू जाति के पूर्वाग्रह थे उतना ही पारसियों का सामाजिक दंभ, मुसलमानों की सांस्कृतिक मानसिक संकीर्णता और अंग्रेजों की जातीय प्रधानता भी। यदि चतुष्कोणीय प्रतियोगिता के जन्म के मूल में पूर्णतया ब्रिटिश सरकार की फूट डालो राज करो की नीति न भी रही हो तो इसकी निरंतरता के बारे में क्या? क्या 1930 और 1940 में प्रतियोगिता की बढ़ रही लोकप्रियता ने पाकिस्तान के आंदोलन के लिए चारे का काम नहीं किया? और अधिक सटीक रूप से क्या सांप्रदायिक क्रिकेट ने सांप्रदायिक वैरभाव को पोषित और गहरा नहीं किया? खिलाड़ियों के अनुसार नहीं।

दो सिंध के खिलाड़ियों ने जिनमें से एक हिंदू और एक अंग्रेज था कहा कि जो सोचता है कि सांप्रदायिक क्रिकेट बुरी भावना को जन्म देता है उसे कराची आकर दोनों खिलाड़ियों और दर्शकों के बीच मौजूद खेल प्रतिद्वंद्विता और अच्छी दोस्ती को देखना चाहिए। उसने इसमें जोड़ा कि वे बहुत बदली हुई राय के साथ वापस जाएंगे।

सांप्रदायिक एकता की भावना पर असर

यह बात 1928 में अखबार के किसी क्रिकेट के पन्ने पर लिखी थी लेकिन करीब दस साल बाद बंबई के एक क्रिकेटर ने भी, जहां पर खेल के और राजनैतिक दांव भी स्पष्ट रूप से ऊंचे थे, यही बात कही। नवंबर 1940 में मुस्लिम कप्तान सैयद वजीर अली को यह कहते हुए उद्धत किया गया कि यह प्रतियोगिता थोड़ी भी राष्ट्रविरोधी नहीं है और इसे भारतीय क्रिकेट के हितों में जरूरी और आवश्यक रूप से जारी रहना चाहिए।

इसके अगले साल जब इस क्रिकेट टूर्नामेंट का भाग्य अधर में लटका हुआ था तो हिंदू कप्तान सीके नायडू ने दावा किया कि इस प्रतियोगिता ने किसी भी प्रकार से सांप्रदायिक भेदभाव को बढ़ावा नहीं दिया है। इसने स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और सांप्रदायिक एकता को बढ़ावा दिया है। इसने समुदायों को बांटने की बजाय मिलाया है।

सीके के एक और साथी मुश्ताक अली के मुताबिक महोत्सव ने हमेशा खिलाड़ियों और जनता के बीच प्रतिस्पर्धा की एक स्वस्थ भावना और खेल भावना को प्रोत्साहन दिया है। उनके अनुभव के अनुसार-स्टैंड के हर तरफ से सराहना की तरंग और शोर ने बिना भेदभाव के अच्छे प्रदर्शन का स्वागत किया है। बेशक यह नायडू (एक हिंदू) के छक्कों के लिए हो, निसार (एक मुस्लिम) की विकेट उखाड़ती गेंदों के लिए हो या फिर भाया (एक पारसी) के चतुर क्षेत्ररक्षण के लिए। क्रिकेटरों के कथन में सच्चाई की झलक थी परंतु क्या सच में यही मसला था?

बंबई तमाशे के एक हफ्ता बाद वार्षिक लाहौर त्रिकोणीय खेली जानी थी। इसमें भाग लेने वाली टीमें हिंदू, मुस्लिम और सिख थीं। परंतु भाग लेने वाली टीमों का ध्यान मार्च में होने वाले चुनावों ने फेर दिया था। प्रतिदिन बढ़ रहे चुनावों के बुखार के फलस्वरूप तेजी से बदतर हो रहे सांप्रदायिक हालात के चलते प्रतियोगिता अंतिम क्षणों में रद्द कर दी गई। जब चुनाव हुए तो मुस्लिम लीग ने पंजाब में अच्छा किया।

क्रिकेट, बंटवारा और आजादी

मार्च और जून 1946 के बीच तीन सदस्यों के एक कैबिनेट मिशन ने भारत का दौरा किया ताकि स्वतंत्रता की शर्तों पर समझौता हो सके। जिन्ना ने पाकिस्तान के निर्माण पर जोर दिया। कांग्रेस ने हमेशा की तरह इसका दृढ़तापूर्वक विरोध किया।

इसी बीच वायसरॉय ने जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस-लीग की एक मिलीजुली अंतरिम सरकार की पेशकश की। कांग्रेस मंत्रियों ने पद की शपथ ली परंतु लीग के मनोनीत लोगों ने उनसे मिलने में देरी की। चुनावी सफलता ने जिन्ना को आवाज उठाने का साहस दिया। अपनी पूरी जिंदगी वह एक संविधान विद रहे थे जो कि अपने मुद्दे पर विधानसभा, कचहरी और प्रेस में बहस करने को तैयार थे। अब उन्होंने डायरेक्ट एक्शन डे की अपील की।

उन्होंने अपने अनुयायियों से सार्वजनिक सभाएं, मार्च और हड़तालें करने को कहा। यह हिंसा के लिए एक खुला निमंत्रण था। जिन्ना के तयशुदा दिन यानी 16 अगस्त को पूरे भारत में दंगे भड़क गए। सबसे बुरी तरह से प्रभावित शहर कलकत्ता था जिसमें दंगों में 4000 लोग मारे गए।

1946 की गर्मियों में जबकि देश में सांप्रदायिक माहौल गरमाया हुआ था, तब एक भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड का दौरा कर रही थी। इसके कप्तान पटौदी के नवाब थे और इसके सदस्यों मे हिंदू, मुस्लिम और ईसाई शामिल थे। यह टीम टेस्ट मैचों में हरा दी गई परंतु इसने कांउटियों के खिलाफ खुद को बड़े प्रशंसनीय रूप से खुद किया। इसके कुछ क्रिकेटरों ने खुद को विश्व स्तर का साबित किया।

विजय मर्चेंट ने सुंदर ढंग से बल्लेबाजी करते हुए दौरे पर 2000 से अधिक रन बनाए और वीनू मांकड़ ने 1000 रनों और 100 विकेटों के साथ ऑल राउंडर की दोहरी भूमिका अदा की। वहां से भारत के लिए विदाई की पूर्व संध्या पर क्रिकेटरों को विदाई के दो परस्पर विरोधाभासी संदेश प्राप्त हुए। श्रीमान स्टेफोर्ड क्रिप्स एक समाजवादी और व्यापार के बोर्ड के प्रधान थे। स्टेफोर्ड क्रिप्स स्वतंत्र भारत के प्रति आशावान थे।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि दौरे पर बनाई गई दोस्ती उन दो देशों के बीच अच्छे संबंध बनाएगी जिसकी हम उम्मीद करते हैं और जिसके लिए हम आगे की सोच रखते हैं। एमसीसी के पूर्व अध्यक्ष श्रीमान पहलाम वार्नर ने अपने संदेश में उन सूत्रों की ओर ध्यान दिलाया जो भारत को साम्राज्य से बांधते थे। उन्होंने क्रिकेटरों की उनके मोहक बर्ताव के लिए प्रशंसा की और फिर कहा कि अभी हुए युद्ध के दौरान आपके सैनिकों की शानदार बहादुरी को इंग्लैंड नहीं भूला है और संभवतः वह भूल भी नहीं पाए।
विज्ञापन

क्रिकेट और तत्कालीन सामाजिक का हालात

आखिरकार पब (प्रतियोगिता) को बंद करना था। फिर भी यह काफी समय से खुला था। 1946 के अंत तक पाकिस्तान का निर्माण तय था और (यह क्रिकेट) महोत्सव अपने कट्टर समर्थकों को छोड़कर सभी के लिए परेशानी का कारण था। उन सर्दियों में पंचकोणीय की जगह ब्रेबॉर्न स्टेडियम ने जोनल प्रतियोगिता की मेजबानी की, यह जेसी मैत्र द्वारा सांप्रदायिक क्रिकेट के बदले में गैर-सांप्रदायिक विकल्प के लिए चलाए गए दो वर्षों के अभियान की पराकाष्ठा थी।

पश्चिमी जोन में मुस्लिम इब्राहिम और ईसाई हजारे, पारसी मोदी और हिंदू मांकड़, अधिकारी और फाड़कर एक साथ खेल रहे थे, इसी प्रकार उत्तरी जोन भी सार्वभौमिक थी। फाइनल में पश्चिमी और उत्तरी जोन आमने-सामने थी। उत्तरी जोन के ग्यारह खिलाड़ियों में हिंदू अमरनाथ और किशनचंद, पारसी ईरानी और आधा दर्जन मुस्लिम क्रिकेटर शामिल थे।

क्रिकेट और क्रिकेटरों की गुणवत्ता उच्च स्तर की थी परंतु भीड़ की प्रतिक्रिया उदासीन थी, क्योंकि कुछ हजार प्रशंसक ही मैच देखने के लिए आए थे। टाइम्स ऑफ इंडिया में हार्टले ने इसकी एक विवेचना लिखी- 'तकरीबन 50 सालों से चले आ रहे बंबई क्रिकेट महोत्सव के निलंबन का बुरा प्रभाव पड़ेगा।' उन्होंने जोड़ा कि पंचकोणीय प्रतियोगिता की अनुपस्थिति खिलाडि़यों और दर्शकों के बीच समान रूप से खेल में रुचि को खत्म कर रही है।

क्रॉनिकल में जेसी मैत्र ने इसके निहितार्थ पर रोष व्यक्त किया कि बंबई के पास क्रिकेट के लिए कोई प्यार या रुचि नहीं है और सिर्फ क्रिकेट के नाम पर सांप्रदायिकता का प्रदर्शन चाहता है। उन्होंने जोर दिया कि बंबई का अपने पसंदीदा खेल के लिए प्यार कहीं ज्यादा और उससे ज्यादा गहरा है। फिर भीड़ इतनी कम क्यों है? मैत्र ने कहा वर्तमान उत्तेजना से भरे राजनैतिक हालात के कारण वहां पर हिंदू और मुसलमानों के बीच एक उच्च तनाव की स्थिति के साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भविष्य की अनिश्चितता थी।

(पेंगुइन बुक्स इंडिया द्वारा प्रकाशित रामचंद्र गुहा की किताब 'विदेशी खेल अपने मैदान पर' का एक संपादित अंश।)
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें