घर के बाहर टीम इंडिया झेल रही है वनडे के साथ टेस्ट क्रिकेट में भी एक के बाद एक हार। इस पर भारत के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का तुर्रा यह है कि टीम बेहतर हो रही है।
यानी मिल रही है नाकामी ही नाकामी फिर भी न माने कप्तान धोनी। उनकी अगुवाई में भारत ने न्यूजीलैंड के हाथों उसकी ही धरती पर दो टेस्ट की सीरीज में 0-1 से गंवा दी।
पांच वनडे की सीरीज भारत मेजबान कीवियों के हाथों 0-4 से पहले ही गंवा चुका था। विदेशी धरती पर तीन बरस में 14 क्रिकेट टेस्ट में भारत को एक भी जीत नसीब नहीं हुई। आइए, जानते हैं कि धोनी की किन-किन जिद के कारण भारत को ऐसी शर्मनाक हार देखनी पड़ी है।
ये है विदेशी धरती पर धोनी की पहली जिद
घर में शेर दिली दिखाने वाले धोनी का मानस विदेशी धरती पर उतरते ही रक्षात्मक हो जाता है। सच तो यह है कि धोनी की जिद की कीमत टीम इंडिया को विदेशों में चुकानी पड़ रही है।
माही अपनी गलतियों को मानने और उनसे सबक लेकर आगे बढऩे से बच रहे हैं। धोनी के टॉस जीतने के बाद पहले फील्डिंग करने के फैसलों हकीकत की बजाय जिद ज्यादा दिखी। उनका यह रुख वनडे के बाद टेस्ट सीरीज में भी जारी रहा।
मजेदार बात यह है कि न्यूजीलैंड दौरे पर खेले सभी सातों मैच में कप्तान धोनी ने ही टॉस जीता था।
नवोदित को आजमाने से किया परहेज
वनडे सीरीज में बतौर ओपनर शिखर और रोहित शर्मा सलामी जोड़ी की नाकामी के बावजूद धोनी ने अजिंक्य रहाणे को एक भी बार बतौर ओपनर नहीं आजमाया। धोनी को समझना होगा केवल इशांत शर्मा, मोहम्मद समी और जहीर खान के बूते ही विदेशी धरती पर टेस्ट में लगातार जीत का परचम लहराने की कामना हकीकत से दूर भागना होगा।
ईश्वर पांडे को न्यूजीलैंड दौरे पर ले जाने के बाद उन्हें वनडे और टेस्ट सीरीज में मौका न देना सभी को अखरा। वनडे सीरीज में जहीर नहीं थे। टेस्ट सीरीज में भुवनेश्वर कुमार, उमेश यादव, नवोदित ईश्वर पांडे को मौका दिया जाना चाहिए था। धोनी प्रयोग से बचे।
धोनी का विकेटकीपिंग पैड खोल कर गेंद संभालना यह साफ करता है उन्हें अपने पेसरों पर भूरोसा नहीं था। दरअसल अब वनडे हो या टेस्ट सीरीज रोटेट कर आजमाने का मौका आ गया है। इशांत शर्मा ने दूसरे टेस्ट के पहली पारी में कहर बरपाने के बाद विपक्षी कप्तान ब्रैंडन मैकुलम का एक रिटर्न कैच छोड़ा। लेकिन इशांत 15 विकेट चटका कर टेस्ट सीरीज में भारत के सबसे कामयाब बॉलर दिखे।
धोनी की जिद से बाहर रहे वीरू-गंभीर
बड़ा सवाल यह है कि टेस्ट क्रिकेट में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी की यह चमक विदेशी धरती पर क्यों नहीं दिख रही? या फिर 'फैब फोर' यानी सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और सचिन तेंदुलकर के अपना बल्ला टांगने से टीम में आए खालीपन को भरने में युवा तुर्कों का नाकाम रहना है।
विदेशी धरती पर टेस्ट में हाल फिलहाल बतौर ओपनर शिखर धवन और मुरली विजय टुकड़ों-टुकड़ों में ही अपना जलवा दिखा पा रहे हैं। बेहतर होता यदि धोनी ने जिद गौतम गंभीर और वीरेंद्र सहवाग में कम से कम किसी एक को तो दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड दौरे पर ले जाने के लिए की होती।
सहवाग भले ही हाल ही में नाकाम रहे हैं लेकिन उनके अनुभव के आधार पर एकदम नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कौन जाने आईपीएल-7 में वीरू और गौती का बतौर ओपनर पुनर्जन्म हो जाए। कुंबले ने जिस तरह सहवाग को अपने विश्वास के बूते ऑस्ट्रेलिया ले गए थे उसी तरह का दांव धोनी ने गोती या वीरू में किसी पर खेला होता सलामी जोड़ी जिस तरह न्यूजीलैंड में नाकाम रही है उस हालत में उनके पास बढिय़ा विकल्प होता।
टेस्ट के बजाए वर्ल्ड कप पर है ज्यादा नजर
कप्तान धोनी के धुरंधरों में विश्वास की जगह अति आत्मविश्वास दिखा। अंतिम एकादश के चयन में धोनी ने दिमाग की बजाय दिल से ही काम ज्यादा काम लिया। धोनी की ख्याति संकटमोचक और बेस्ट फिनिशर यानी मंजिल तक पहुंचाने वाले बल्लेबाज की रही है।
दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ उसकी धरती पर सीरीज के बाद इस बार न्यूजीलैंड की धरती पर उनकी खुद की बैटिंग में बतौर बल्लेबाज 'फिनिशर' का टच गायब ही रहा। धोनी की बल्लेबाजी को देखकर यही लगा कि मानों वह केवल हाफ सेंचुरी जड़ कर ही संतुष्ट हो जाते रहे हैं।
धोनी ने हाल ही में कहा था कि उनकी तमन्ना अब वनडे वर्ल्ड कप बरकरार रखने की है। यदि धोनी के यही नक्शे रहे तो फिर उनके और भारत के लिए यह हसरत दूर की कौड़ी हो जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि अगले साल होने वाले वनडे वर्ल्ड की मेजबानी ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड संयुक्त रूप से कर रहे हैं। इन पिचों पर धार और रफ्तार के स्विंग के माहिरों की तूती बोलेगी।
अमित मिश्रा के प्रति दिखाई जबर्दस्त बेरुखी?
कप्तान धोनी वनडे सीरीज में रविचंद्रन अश्विन और रवींद्र जडेजा पर बतौर ऑलराउंडर जरूरत से ज्यादा निर्भर दिखे। टेस्ट सीरीज में सही मायनों में टीम में कोई माहिर स्पिनर को माही ने उतारा ही नहीं। रवींद्र जडेजा लेफ्ट आर्म स्पिनर कम बैटिंग ऑलराउंडर ज्यादा दिखे।
कभी स्पिन भारतीय बॉलिंग की रीढ़ हुआ करती थी। दरअसल धोनी अश्विन और रवींद्र जडेजा को यह समझाने में नाकाम रहे कि वे टीम में बतौर स्पिनर हैं न कि ऑलराउंडर। अश्विन और जडेजा को धोनी को यह समझाने की जरूरत है कि वे पहले बॉलर हैं और फिर बल्लेबाज। दरअसल अश्विन और जडेजा ने वनडे में हाफ सेंचुरी जड़ी लेकिन विकेट लेने के लिए जूझते लगे।
धोनी अपने तुरुप के इन दोनों इक्कों को यह बात समझाने में नाकाम रहे कि टीम में उनका काम विकेट चटकाना ही है। यदि वे विकेट नहीं लेंगे तो फिर उनकी कोई जगह नहीं है।
रवींद्र जडेजा भी गेंद की बजाय बल्लेबाजी पर ज्यादा ध्यान देते लगे। ऐसे में यदि यही हाल रहा तो ये दोनों अभी बॉलिंग को छोड़ बल्लेबाजी पर तवज्जो देने के फेर में बतौर बॉलर लय गंवा कर इरफान पठान की तरह टीम में अपनी जगह न खो दें।
ले देकर केवल तीन बॉलरों के सहारे न तो वनडे और न ही टेस्ट मैच में जीत की इबारत लिखने की उम्मीद की जा सकती है। लगता है धोनी को लेग स्पिनर अमित मिश्रा से कोई खास खुन्नस है या फिर उन पर भरोसा ही नहीं है। जब धोनी की जगह जिंबाब्वे टूर पर विराट कोहली को कप्तानी सौंपी गई थी तो वहां सबसे कामयाब बॉलर अमित मिश्रा ही रहे थे। ऐसे में अमित मिश्रा को न खिलाने की धोनी की जिद पर सवाल उठाए जाने लाजिमी हैं।
विराट हीरो भी, जीरो भी
भारत की बल्लेबाजी की बात करें तो फिर विराट कोहली, शिखर धवन और अजिंक्य रहाणे को छोड़कर कर बाकी नाकाम रहे। विराट, शिखर और अजिंक्य रहाणे ने न्यूजीलैंड में उसके खिलाफ टेस्ट सीरीज में सेंचुरी जड़ीं।
रोहित शर्मा का प्रदर्शन टुकड़ों-टुकड़ों ही अच्छा रहा। चेतेश्वर पुजारा न्यूजीलैंड में लय नहीं पा सके। विराट कोहली की दो गलतियां पहले तो पहले टेस्ट की दूसरी पारी में गैर जिम्मेदारी से खेला गया शॉट और दूसरे टेस्ट में न्यूजीलैंड की दूसरी पारी में मोहम्मद शमी की गेंद पर टपकाया गया ब्रेंडन मैकुलम का कैच।
यदि विराट दोनों मौकों पर ज्यादा एकाग्र रहे होते कम से कम टेस्ट सीरीज भारत 0-1 से गंवाने के बजाय 2-0 से जीतता। जब मैकुलम का यह कैच विराट ने टपकाया जब वह बमुश्किल दहाई के अंकों में पहुंचे थे।
धोनी की कप्तानी मार्च तक बनी रहेगी
धोनी अभी एशिया कप और टी-20 वर्ल्ड कप के लिए भारत के कप्तान हैं। ऐसे में फिलहाल धोनी को कप्तानी से हटा कर उनकी जगह विराट कोहली को कप्तानी सौंपी जैसी चर्चा ही बेमानी है।
विराट में अच्छे कप्तान की संभावनाएं जरूर है। विराट कोहली फिलहाल टीम इंडिया के नंबर वन बल्लेबाज हैं। ऐसे में यदि विराट को कप्तानी सौंपी जाती है तो वह ज्यादा दबाव में आ सकते हैं।
विराट कोहली में जोश और टीम को साथ लेकर चलना भी आता है। अक्सर विराट जोश में होश गंवा देते हैं। धोनी अंतिम एकादश को चुनने में दिल की बजाय दिमाग से ज्यादा सोचेंगे और एशिया कप और टी-20 वल्र्ड में उम्मीद करें धोनी गलतियों से सीखेंगे।