न कोई मदद, न कोई कोच, सहारा था तो सिर्फ अपने हौसले और दोस्ती का। समर कैंप में शौकिया फुटबॉल सीखने के बाद ठान लिया कि कुछ कर दिखाना है।
कई खिलाड़ी खेल चुकीं नेशनल
आज दून की गर्ल्स फुटबॉल टीम वजूद में है। टीम की कई खिलाड़ी नेशनल खेल चुकी हैं, जबकि अनीता रावत भारतीय अंडर-16 और अंडर-19 टीम से दो इंटरनेशनल टूर्नामेंट खेल चुकी हैं।
मोनिका बिष्ट एनआईएस कोच बनी हैं तो शुचिता खरोला रेफरी। सीमित संसाधन और बेहद कम सुविधाओं के बावजूद इन्होंने खुद को न सिर्फ साबित किया है, बल्कि पुरुष वर्चस्व वाले माने जाने वाले फुटबॉल में आज परचम भी फहरा रही हैं।
2007 में हुई शुरुआत
वर्ष 2007 में विजय कैंट क्लब के समर कैंप में इन लड़कियों ने फुटबॉल को पहली बार छुआ। तब टीम में 36 लड़कियां थीं।
मोनिका बिष्ट बताती हैं कि वरिष्ठ फुटबॉलर रतन थापा ने खेल सिखाया। कैंप के बाद 20 लड़कियों ने अपनी टीम तैयार की।
2007 में ही अनीता, शुचिता और मोनिका को राज्य की टीम में चुना गया। वर्ष 2009 में कई खिलाड़ी इधर-उधर हो गईं।
सात माह पूर्व मोनिका, शुचिता और हाल में संपन्न गर्ल्स चैलेंज कप में 11 गोल दागने वाली ज्योति गड़ीवाल ने फिर खिलाड़ियों को जुटाया। अब टीम फिर पुराने अंदाज में सामने है।
इसी वर्ष देहरादून फुटबॉल एकेडमी ने गर्ल्स टीम को खुद से जोड़ लिया है, जिसकी चीफ कोच मोनिका बिष्ट हैं। महिंद्रा ग्राउंड में हर शाम टीम अभ्यास के लिए जुटती है।
नेशनल में दिखाया दम
टीम की एक दर्जन से अधिक खिलाड़ी नेशनल तक पहुंची हैं। सबसे अधिक नौ नेशनल टूर्नामेंट ज्योति गड़ीवाल ने खेले हैं।
श्वेता खरोला ने 8, मोनिका ने 5, शुचिता और अनीता ने 4- 4 नेशनल टूर्नामेंट खेले हैं। रचना रावत, पूनम रावत, नेहा आनंद, मीनाक्षी, श्लाखा कनौजिया, बीना आदि भी नेशनल खेल चुकी हैं।
अब खुशी गुरुंग, मीनाक्षी, अलीशा, वैष्णवी, लूसी, अंजलि, शिल्पा भी टीम से जुड़ी हैं। टीम में शामिल लड़कियों की उम्र 16 से 20 साल तक है, जबकि कोच मोनिका 24 की हैं।
नाम छपा तो हुए मुंह बंद
मोनिका और शुचिता ने बताया कि उनके खेलने पर लोग बातें बनाते थे। मां ने हौसला बढ़ाया तो खेल जारी रहा। जब पहली बार अखबार में नाम छपा, तब लोगों के मुंह बंद हुए।
मोनिका बताती हैं कि उनके एनआईएस कोच बनने की खबर अमर उजाला में छपते ही पूरा गांव बधाई देने घर आ गया था।