वर्ष 1992 में नदिया की एक गूंगी-बहरी लड़की के साथ माकपा कार्यकर्ताओं द्वारा बलात्कार करने की घटना पर ममता बनर्जी ने विरोध का नायाब तरीका चुना था। लड़की और उसकी मां के साथ वह राइटर्स बिल्डिंग के उस गलियारे में धरने पर बैठ गई थीं, जहां से मुख्यमंत्री ज्योति बसु को अपने केबिन में जाना था। लेकिन मुख्यमंत्री के आने से पहले ही पुलिस बलों ने बाल पकड़कर घसीटते हुए ममता को बाहर कर दिया था।
2009 में सिंगुर में लेफ्ट के कार्यकर्ताओं ने तापसी मल्लिक के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी, तो टाटा नैनो के खिलाफ आंदोलन करती दीदी को नया हथियार मिला था। 'मां, माटी, मानुष' जैसा नारा उन्होंने उसी समय गढ़ा। तृणमूल ने उस हत्याकांड की याद में तापसी मल्लिक दिवस मनाने की शुरुआत की, और दिसंबर, 2011 में तापसी मल्लिक की एक प्रतिमा का सिंगुर में अनावरण भी किया! लेकिन तृणमूल के सत्ता में आने के बाद फरवरी, 2012 में पार्क स्ट्रीट में एक विदेशी महिला के साथ बलात्कार हुआ, तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे फर्जी खबर बताया, जो कि उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए फैलाई गई थी।
वर्ष 2013 में बारासात के कामदुनी में एक लड़की के साथ बलात्कार हुआ, तो ममता को वहां पहुंचने में ही आठ दिन लग गए। पीड़ित लड़की के घर से निकलने पर क्षुब्ध महिलाओं ने जब उनसे कुछ सवाल किए, तो तमतमाए मुख्यमंत्री का जवाब था, 'शट अप'। कोलकाता पहुंचते-पहुंचते उन्हें कोई संदेह ही नहीं रह गया था कि कामदुनी की वे औरतें माओवादी थीं! मालदा के कालियाचक में जिन लोगों ने पुलिस थाने में आगजनी और तोड़फोड़ की, वे तृणमूल के कार्यकर्ता बताए जाते हैं। दक्षिण कोलकाता के अलीपुर में पुलिस के जवानों के साथ मारपीट करने वाले शख्स प्रताप साहा के साथ बात करते ममता बनर्जी की तस्वीर अखबारों में छपी है। कहने की जरूरत नहीं कि प्रताप साहा तृणमूल का कार्यकर्ता है। बंगाल में पुलिस से सीधे टकराने की हिम्मत सिर्फ सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं-गुंडों को ही हो सकती है।
नहीं, यह ममता की शैली नहीं है। यह दरअसल उस वाम मोर्चे की शैली है, जिसने चौंतीस साल तक पश्चिम बंगाल में सरकार चलाई, और अपने साढ़े चार साल की सत्ता में दीदी ने जिसका हू-ब-हू अनुकरण किया। ममता लेफ्ट से भी ज्यादा लेफ्ट हैं, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वह सूती साड़ी और सैंडल पहनती हैं तथा बुके भेंट करना भी उन्हें फिजूलखर्ची लगता है, बल्कि सबसे ज्यादा इसलिए कि आलोचकों तथा सवाल करने वालों को विरोधी, दलाल और शत्रु बताना भी उस वाम शासन की शैली है, जो अपने समय में निरंकुश हो गया था। वाम शासन ने राज्य की जनता के लिए दो शब्द ईजाद किए थे-आमरा-ओरा। हम और वे। हम यानी हमारे समर्थक-वे यानी सवाल उठाने वाले। ममता भी राज्य के लोगों को इसी चश्मे से देखती हैं। इसीलिए असुविधानजक सवाल करने पर वह टेलीविजन चैनल से निकल जाती हैं, किसी आयोजन में प्रश्न करने वाला युवा उन्हें माओवादी और कार्टून भेजने वाला प्रोफेसर उन्हें अलगाववादी लगता है।
तानाशाही की पराकाष्ठा तो पिछले दिनों तब देखने को मिली, जब कोलकाता में रवींद्र सरोवर के पास सुबह टहलते हुए सरकार की नीति की आलोचना करते मारवाड़ी व्यापारियों को तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी ने धमकाने की कोशिश की। बाद में वहां सादी वर्दी में पुलिस की गश्त बढ़ा दी गई, ताकि लोग सरकार के खिलाफ न बोल सकें! ये घटनाएं बताती हैं कि कल्चर बदलना तो दूर, तृणमूल की सरकार उसे और निचले स्तर पर ले गई है। इन साढ़े चार वर्षों में पश्चिम बंगाल भले न बदला हो, पर इस अवधि ने खुद दीदी को भीतर से बहुत बदल दिया है। गुस्सैल हालांकि वह अब भी हैं। न उनकी सनक में कोई कमी आई है, न सादगी में। लेकिन इस दौरान घोटाले, षड्यंत्र और भितरघात ने उन्हें इतना आहत, बेचैन और सशंकित किया कि कविता, रवींद्र संगीत, और चित्रकारी बहुत छूट गई लगती है।
ममता बनर्जी ने जब पश्चिम बंगाल में लंबे चौंतीस वर्षों के वाम मोर्चे के लाल दुर्ग को ध्वस्त कर सत्ता हासिल की थी, तब उनकी उपलब्धि को चुनावी राजनीति में याद रखने लायक बताया जा रहा था। लेकिन उनके अब तक के मुख्यमंत्री काल में कायदे से एक ठोस उपलब्धि नहीं है। उल्टे उनकी विफलताओं की सूची लंबी है। उनके मुख्यमंत्री काल की शुरुआत कच्ची शराब से मौत और अस्पतालों में बच्चों की मृत्यु से हुई थी। सारदा घोटाले ने तो ममता बनर्जी सरकार की चूलें हिला दी थीं; उनके कई नजदीकी शिकंजे में फंसे और जांच की आंच खुद मुख्यमंत्री तक पहुंचती दिख रही थी। उसके बाद वर्धमान बम विस्फोट ने पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी अलगगाववादियों की पैठ को रेखांकित किया था, अब मालदा के कालियाचक में हुई हिंसा और तोड़फोड़ ने इस भीषण सच्चाई को और घनीभूत ही किया है।
आर्थिक मोर्चे पर भी तस्वीर बहुत आशाजनक नहीं है। अमित मित्रा जैसे व्यक्ति को वित्त मंत्री बनाने का भी सूबे को कोई लाभ नहीं हुआ है। सिंगुर और नंदीग्राम में औद्योगीकरण का विरोध करके ही ममता पश्चिम बंगाल की सत्ता में आई हैं। लिहाजा उनसे आर्थिक मोर्चे पर पहलकदमी की वैसे भी बहुत उम्मीद नहीं कर सकते। पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है, जहां ज्योति बसु ने उद्योगों की ओर ध्यान दिए बिना ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दशकों गुजार दिया, लेकिन बुद्धदेव ने औद्योगीकरण की पहल क्या की, उनकी सत्ता ही चली गई। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने कुछेक कदम उठाए हैं। बल्कि आंकड़े बताते हैं कि उनका प्रदर्शन पिछली कम्युनिस्ट सरकार से, थोड़ा ही सही, पर बेहतर है। सत्ता में आने के बाद से वह सालाना बिजनेस समिट आयोजित करती हैं, हालांकि उससे कितना निवेश आया है, इसका ठोस आंकड़ा नहीं है।
सरकार के मुताबिक, इस साल ग्लोबल बेंगॉल ग्लोबल समिट में ढाई लाख करोड़ के निवेश के प्रस्ताव आए हैं। पर सच्चाई कोई नहीं जानता। हां, एक फैसले के लिए ममता की तारीफ जरूर करनी चाहिए। सत्ता में आने के बाद से हड़तालों के खिलाफ उन्होंने सख्ती बरती है। इसका नतीजा यह है कि बंद की संख्या में कमी आई है। पिछले साल अगर बिहार विधानसभा का चुनाव राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना, तो इस वर्ष पश्चिम बंगाल के चुनाव से राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचने की उम्मीद की जा रही है।
संभवतः इसलिए भी कि इस साल जिन पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें से असम को छोड़कर शेष राज्यों के चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति पर उतना असर पड़ता महसूस नहीं होता। लेकिन पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव क्या सचमुच अपने कुल प्रभाव में बिहार चुनाव जैसा साबित होगा? ठीक है कि ममता के खाते में विफलताएं ही ज्यादा हैं। जिस पोरिबर्तन के नारे के साथ वह सत्ता में आई थीं, वह भी कहीं दिखता नहीं है। अलबत्ता सिर्फ इसी कारण विधानसभा चुनाव में उनके पराभव की कल्पना करना भोलापन होगा।