भारत जैसे मुल्क में जहां सत्ता और कथित परंपराओं का विरोध करने पर आपको विदेशी एजेंट करार दे दिया जाता हो, वहां ग़र परंपराएं बदलने या उन पर रोक लगाने की बात पर बहस छिड़ जाए, यही अपने आप में एक बड़ी बात है। अगर हम सच कहना चाहें तो कह सकते हैं कि मुल्क में परंपराओं के नाम पर लैंगिक और सामाजिक विभेद के मामले सामने आ रहे हैं, जिन पर कई बार सरकारों के फैसले दुःख पहुंचाने वाले होते हैं।
यूं तो कहा जाता है कि कभी भी कोई फैसला जनभावनाओं के आधार पर नहीं दिया जाता लेकिन ऐसा न जाने क्यों अब लगने लगा है कि हमारे मुल्क में कानून पर जनभावनाएं हावी हो रही हैं जो आने वाले समय के लिए कहीं से भी शुभ संकेत नहीं हैं।
ताजा मामला, तमिलनाडु के जल्लीकट्टू खेल का है जिस पर केंद्र सरकार ने बीते 8 जनवरी को एक अधिसूचना जारी कर के इस खेल को खेले जाने की परमिशन दे दी। जिसके लिए राज्य की मुख्यमंत्री जयललिता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद भी दिया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले पर फिर से रोक लगा दी। जब यह अधिसूचना जारी की गई, उसके कुछ देर बाद ट्वीटर पर #WeNeedJalikattu ट्रेंड करने लगा।
इस परंपरा का समर्थन करने वालों का यह तर्क था कि एक ओर लोगों को जानवरों को खाने की इजाजत तो है लेकिन उन्हें जानवरों के साथ खेलने की परमिशन भी नहीं दी जा रही है। इस के समर्थन में ट्वीटर पर ऐसी ढेरों फोटो शेयर की गई जो आपको भावनात्मक रूप से जल्लीकट्टू के पक्ष में सोचने को मजबूर कर देती लेकिन शायद वो फोटो शेयर नहीं की जिसमें एक सांड लोगों के झुण्ड से खुद को बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था।
ग़र आप जल्लीकट्टू पर गूगल करेंगे तो आप ये भी देखेंगे कि कितनी बेरहमी से लोग सांड को जमीन पर गिरा कर, उसे पर अपनी विजय पताका लहराते नजर आते हैं। ऐसा क्यों हैं कि हम सिर्फ अपनी कथित परंपराओं के नाम पर कुतर्क करते हैं और बड़ी बेशर्मी से कहते हैं कि वो हमारा हक है। किसी के साथ खेल-खेल में आप उसे मारने पर उतारू तो नहीं हो जाते। फिर आखिर ऐसी परंपराओं का समर्थन ही क्यों करते हैं जो किसी भी रूप में उचित नहीं है।
हमारे मुल्क में समस्या यह है कि ग़र आप किसी की परंपरा पर कोई बहस शुरू करना चाहते हैं जो कि आज के समय में कहीं से भी प्रासंगिक नहीं है, तो सीधी आंच उस परंपरा के पक्षधरों के धर्म और जाति तक पहुंच जाती है। आइए अब आपको दूसरी ओर ले चलते हैं, मामला केरल के सबरीमाला मंदिर का है, जहां यह प्रथा है कि वह महिला मंदिर में प्रवेश नही कर सकती जिनका मासिक धर्म शुरू हो चुका है। इतना ही नहीं मंदिर के ट्रस्ट के प्रमुख प्रयार गोपाल कृष्णन ने तो यहां तक बयान भी दिया था कि मंदिर में महिलाओं का प्रवेश तब तक नहीं हो सकता जब तक कि ऐसी मशीन का अविष्कार न हो जाए जो यह बता सके कि महिला माहवारी में है अथवा नहीं। इस बयान के विरोध में सोशल मीडिया पर #HappyToBleed नाम से कैंपेन भी चला था। यहां प्रश्न यह है कि आखिर आप यह तय करने वाले कौन हैं कि मंदिर में कौन आए जाए और कौन नहीं?
क्या आपको भगवान ने सीधा नियुक्त किया है? या फिर आप यह सब पुरूषवादी साजिश के तहत कर रहे हैं? इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने कहा है कि संविधान के तहत ऐसा नहीं कर सकते। अब इसके भी पक्ष में तर्क देने वालों का कुतर्क सुनेंगे तो आप वाकई इस सोच में पड़ जाएंगे कि क्या आप ऐसे समाज को जन्म तो नहीं दे रहे हैं जो जन्म लेने से पहले ही विनाश की ओर अपने कदम बढ़ा रहा है।
ग़र आप नहीं जानते होंगे तो यह जानकर हैरानी होगी कि एक ओर जो समाज महिलाओं को इस तरह से दरकिनार कर रहा है वहीं दूसरी ओर यही समाज महिलाओं की माहवारी को धार्मिक मान्यता भी दे रहा है। आप कभी असम के कामाख्या मंदिर के बारे में जरा सा गूगल करेंगे तो आप को वहां के बारे में बहुत सी जानकारी मिल जाएगी। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां देवी की योनि की पूजा होती है और ऐसा माना जाता है कि देवी स्वयं रजस्वला होती है।
उसके बाद देवी से रक्त से सने कपड़े को लेने के लिए लोग होड़ मचा देते हैं। खुद मंदिर के पुजारी इस बात को लेकर मंदिर का खासा महिमामंडन करते हैं। फिर आखिर ऐसा दोहरा चरित्र क्यों? क्या यहां आपको किसी तरह से अछूतापन या महसूस नहीं होता या फिर आप एक बंधे बंधाए ढर्रे पर चलने के आदी हो गए हैं कि जो आपको जिस राह पर ढकेल देगा, आप उसी ओर चल देंगे।
मुल्क की सबसे बड़ी दूसरी आबादी मुस्लिम है। यहां भी कई ऐसी बंदिशे हैं जो न जाने कैसे लोगों को बर्दाश्त हो रही हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि कोई महिला मस्जिद में जाकर खुदा की इबादत नहीं कर सकती? बीते दिनों मुंबई के हाजी अली में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई जिसके बाद इसका कानूनी रूप से विरोध किया गया, लेकिन अभी तक इसका कोई हल नहीं निकला। आखिर ऐसा क्यों हैं?
मेरा एक बहुत सीधा सा सवाल धर्मों के ठेकेदारों से है कि आखिर ग़र आपके भगवान और उनके अल्लाह को महिलाओं से इतनी ही दिक्कत थी, तो आखिर उन्हें बनाया ही क्यों? अब जबकि हम सभी जानते हैं कि माहवारी गर्भावस्था के लिए तैयार होने के लिए एक शारीरिक जरूरत है, वह अपवित्र कैसे हो गया? महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में बीते दिनों जब एक महिला ने जाकर पूजा पाठ की तो खासा बवाल मच गया।
मंदिर ट्रस्ट ने कहा कि वे परंपरा का सम्मान करते हैं और 400 साल पुरानी इस परंपरा को तोड़ नहीं सकते है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात तो यह है कि जब इतिहास में पहली बार इस मंदिर के ट्रस्ट की अध्यक्ष अनीता शेट्टे ने भी कह दिया कि बावजूद उनके अध्यक्ष होने के 400 साल पुरानी इस परंपरा का पालन किया जाएगा। सारी बात यहीं खत्म।
एक और आखिरी बात! कर्नाटक के मंगलोर में ब्राह्मणों के जूठन पर लेटने की परंपरा है। इस परंपरा के बारे में भी बताया जा रहा है कि यह करीब 500 साल पुरानी है। जब इस के बारे में शिकायत की गई और राज्य सरकार ने एक जांच टीम भेजी तो, टीम को मार खाकर वापस आना पड़ा। वो भी उनकी मार, जो उस जूठन पर लेटते हैं। जब मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा तो एक पक्ष ने कहा कि हमें इस पर लेटने दिया जाए क्योंकि यह हमारी परंपरा है।
अब जरा आप ये सोच कर बताइए कि जिस देश ने दुनिया को जीरो दिया, चांद और तारों की भाषा सिखलाई, ग़र वहां परंपराओं के नाम पर लैंगिक और सामाजिक विभेद और जानवरों पर अत्याचार किया जाए, तो यह कहां तक उचित है। क्या हम सिर्फ सपने में ही विश्वगुरू बनने की ओर हैं।