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यह पहाड़ कब टूटेगा

Sun, 16 Aug 2015 07:28 PM IST
नई दिल्ली
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किसी आदमी की गरीबी और परिस्थितियों से उसका संघर्ष अलग-अलग लोगों के लिए अचानक एक साथ किस तरह महत्वपूर्ण हो जाता है, यह बिहार में गया जिले की एक अल्पज्ञात जगह गेहलौर के स्वर्गीय दशरथ मांझी के जीवन से जाना जा सकता है, जिनकी मृत्यु को भी अब करीब आठ साल हो गए हैं।
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पहाड़ काटकर सड़क बनाने का जो असाध्य काम दशरथ मांझी ने एक दिन अपने हाथ में लिया था, वह सिर्फ उनकी पत्नी के दुख से उत्पन्न नहीं था, बल्कि उसके पीछे दूसरे असंख्य लोगों का उपकार करने का विराट लक्ष्य भी था। अपने संघर्ष में वह निपट अकेले थे, लेकिन उपलब्धि के समय उनके आसपास भीड़ थी। और अब तो उन्हें भुनाने की जैसे होड़ लगी है।

इसी सप्ताह उनके जीवन पर केतन मेहता की फिल्म मांझी-द माउंटेन मैन रिलीज होने वाली है, जिसे बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने टैक्स फ्री करने की घोषणा की है। इस साल बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी दशरथ मांझी को मुद्दा बनाया जा रहा है। थोड़े समय के लिए मुख्यमंत्री रह चुके जीतनराम मांझी को लगता है कि इस शख्सियत के नाम पर वह बिहार में महादलितों के करीब सोलह प्रतिशत वोट बैंक पर कब्जा जमा सकते हैं। इसी कारण पिछले कुछ समय से गेहलौर में अचानक नामचीन लोगों का जमावड़ा लगने लगा है।
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विडंबना यह है कि इन बड़े लोगों की मौजूदगी के बावजूद दशरथ मांझी के परिजनों की विपन्नता कम नहीं हुई है। दशरथ मांझी की पत्रवधु का पिछले साल समय पर इलाज न होने से निधन हो गया और उनके नाम पर बने अस्पताल में डॉक्टर ही नहीं हैं। यह सही है कि दशकों पहले छेनी-हथौड़ा लेकर पहाड़ काटने बैठे दशरथ मांझी को समाज और सरकार से कुछ नहीं चाहिए था। पर जो काम उन्होंने किया, उसके बदले में उनके परिजन सामान्य सुख-सुविधाओं के हकदार तो हैं ही।

दशरथ मांझी को दी जानेवाली कोई भी श्रद्धांजलि उनके परिवारजनों और गेहलौर की अनदेखी करते हुए संभव नहीं है। दुर्गम पहाड़ को हथौड़े से तोड़ने में दशरथ मांझी को बाईस साल लगे थे। लालफीताशाही और संवेदनहीनता के पहाड़ को तोड़कर उनके परिजनों तक पहुंचने में हमारे समाज और हमारी सरकारों को कितने दशक लगेंगे?
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