जम्मू-कश्मीर और झारखंड के विधानसभा चुनावों में भाजपा के अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बावजूद इन दोनों राज्यों के नतीजों के अलग अर्थ हैं। महाराष्ट्र और हरियाणा की तरह इन दोनों राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही पार्टी का चेहरा थे और नतीजे बता रहे हैं कि भाजपा के झारखंड में सरकार बनाने की स्थिति में आने और जम्मू-कश्मीर में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के बावजूद लोकसभा चुनाव के समय उठी 'मोदी लहर' अब कमजोर पड़ गई है!
हालांकि अपने निर्माण के बाद से नौ सरकारें देख चुके झारखंड को पहली बार स्थिर सरकार मिल रही है, जैसा कि चुनाव हारने के बाद बाबूलाल मरांडी ने अपने झारखंड विकास मोर्चा के भाजपा में विलय का संकेत दिया है। मगर भाजपा का प्रदर्शन उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा है, उसे लोकसभा चुनाव में 56 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। इसके अलावा तीन बार मुख्यमंत्री रहे अर्जुन मुंडा और भाजपा की सहयोगी ऑल झारखंड स्टुडेंट यूनियन के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो को पराजय देखनी पड़ी है। सत्ता विरोधी रुझान के बावजूद हेमंत सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा को सीटों के मामले में पिछली बार से बेहतर स्थिति में लाने में सफल हुए हैं, तो इसका मतलब है कि स्थिर सरकार के सामने एक मजबूत विपक्ष भी होगा।
वहीं जम्मू-कश्मीर के नतीजे मोदी और अमित शाह के 'मिशन 44 प्लस' से कोसों दूर हैं। इन नतीजों के संदेशों को समझने की जरूरत है। भाजपा को घाटी और लद्दाख के हिस्से की 50 में से एक भी सीट नहीं मिली है! जबकि प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही मोदी ने कश्मीर को खास तवज्जो दी है। इसके बावजूद वह घाटी के लोगों का दिल नहीं जीत सके। वहीं पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी राज्य में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। भाजपा को सिर्फ जम्मू क्षेत्र में ही सीटें मिली हैं, जिससे जम्मू और घाटी का अंतर ज्यादा स्पष्ट ढंग से उभरकर सामने आया है। यही नहीं, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन भी किया है।
और यह सब तब हुआ है, जब राज्य के लोगों ने 1987 के बाद पहली बार बड़ी तादाद में मतदान किया। जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए ये नतीजे, मोदी के जुमले में कहें, तो उस आधे खाली गिलास की तरह हैं, जिसमें उम्मीद भरने की जरूरत है। क्या मोदी और मुफ्ती इसके लिए तैयार हैं?