विद्यालयी परीक्षाओं में संगठित तरीके से होने वाली नकल को लेकर पहले ही बदनाम रहे उत्तर प्रदेश में संयुक्त मेडिकल प्रवेश परीक्षा (सीपीएमटी) के पर्चे लीक होने की कथित घटना यही बताती है कि यहां शिक्षा के साथ कैसे खिलवाड़ किया जा रहा है। डेढ़ हजार से भी कम सीटों के लिए एक लाख से अधिक छात्र इस परीक्षा में शामिल होने वाले थे, जिससे पता चलता है कि कितनी कड़ी स्पर्धा से होकर इन छात्रों को गुजरना था।
जिस तरह से दो बैंकों के स्ट्रांग रूम में रखे प्रश्नपत्रों के बक्सों से छेड़छाड़ किए जाने की बात सामने आई है, उससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह एक-दो लोगों का काम नहीं हो सकता। अमूमन व्यावसायिक या प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र कड़ी सुरक्षा में पुलिस के पास या फिर सरकारी कोषागारों में रखे जाते हैं, मगर परीक्षा की आयोजक किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी ने इन्हें बैंकों के स्ट्रांग रूम में रखने का फैसला लिया। प्रशासन और परीक्षा के आयोजकों के बीच प्रश्नपत्रों को बैंकों के स्ट्रांग रूम में रखे जाने को लेकर विवाद हो सकता है, मगर मूल प्रश्न कहीं अधिक गंभीर है।
उत्तर प्रदेश में प्रवेश या व्यावसायिक परीक्षाओं के पर्चे लीक होने का यह पहला मामला नहीं है। पिछले वर्ष ही उत्तर प्रदेश में कर्मचारी चयन आयोग की संयुक्त परीक्षा के पर्चे लीक हो गए थे, जिसके कारण परीक्षा स्थगित करनी पड़ी थी। उससे पहले वर्ष 2011 में इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा एआईईईई के पर्चे लीक होने के कारण परीक्षा टालनी पड़ गई थी। हैरानी की बात यह है कि बीते एक दशक में हुई ऐसी दर्जन भर से अधिक घटनाओं के बावजूद उत्तर प्रदेश का व्यावसायिक और प्रवेश परीक्षाओं का ढांचा मजबूत नहीं बन सका है।
बेशक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में भी व्यावसायिक परीक्षा मंडलों की अनेक परीक्षाएं शक के दायरे में आई हैं, लेकिन इस तरह की सारी घटनाएं अंततः प्रतिभाशाली और मेहनती छात्रों का हौसला पस्त कर देती हैं। ऐसे समय में जब किसी ट्रक ड्राइवर के बेटे के आईआईटी में दाखिले की या फिर निम्न मध्यवर्गीय परिवार की किसी बेटी के आईएएस जैसी कड़ी स्पर्धा में पास होने की खबर आती हो, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी महत्वपूर्ण परीक्षा के पर्चे लीक होने से कितने बच्चों की मेहनत पर पानी फिर जाता होगा और कितने सपने टूट जाते होंगे।