सोलहवीं लोकसभा के लिए अब तक तीन चरणों में हुए चुनाव में मतदाताओं के उत्साह का जो सिलसिला देखा गया है, वह रेखांकित करने वाला है। शुरुआती दो चरणों में पूर्वोत्तर की बारह सीटों के लिए हुए चुनाव में मतदाताओं की जैसी लंबी कतारें थीं, तीसरे चरण में ग्यारह राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों की इक्यानबे सीटों पर वैसा ही उत्साह देखा गया।
बेशक नक्सल प्रभावित बस्तर अपवाद रहा, जहां विधानसभा चुनाव की तुलना में वोटिंग कम दर्ज की गई। मतदाताओं में बढ़ती जागरूकता, महिला वोटरों की बढ़ती भागीदारी और युवा मतदाताओं की बढ़ी संख्या के अलावा चुनाव आयोग की पहल और राजनीतिक पार्टियों के आक्रामक प्रचार का ही नतीजा है कि चुनावों में मतदाताओं का प्रतिशत पहले की तुलना में अधिक होने लगा है।
हालांकि तीसरे चरण में चुनावी हिंसा का उभार थोड़ा चिंतित करने वाला है। बिहार के जमुई में आईईडी विस्फोट से दो सुरक्षाकर्मियों की मौत, और छत्तीसगढ़ के बस्तर तथा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में नक्सलियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच गोलीबारी हुई, तो ओडिशा के कोरापुट और मलकानगिरि में नक्सलियों के ईवीएम मशीन लेकर भागने की सूचनाएं हैं। अब तक हुआ मतदान चुनावी नतीजा तय करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। मसलन, सिर्फ यही नहीं कि तीसरे चरण में दिल्ली, हरियाणा और केरल की सभी सीटों पर चुनाव हो चुके हैं, बल्कि इस चरण में कांग्रेस, भाजपा और नवोदित आम आदमी पार्टी-तीनों का बहुत कुछ दांव पर लगा है।
इन इक्यानबे सीटों में से लगभग आधे पर चूंकि कांग्रेस ने पिछले चुनाव में जीत हासिल की थी, लिहाजा इन पर अपना कब्जा बनाए रखने की उसके सामने बड़ी चुनौती होगी, तो भाजपा के लिए केरल और लक्षद्वीप को छोड़ शेष जगह बेहतर प्रदर्शन का दबाव होगा। मुजफ्फनगर के दंगे की पृष्ठभूमि में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दस सीटों पर इन दलों के साथ ही सूबे की दो पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी सपा और बसपा की भी कड़ी परीक्षा है।
इसी तरह दिल्ली और हरियाणा में आप का चुनावी नतीजा उसका भविष्य तय करेगा। हालांकि छह चरणों का मतदान अभी शेष है, पर मतदाताओं का रवैया आश्वस्त करता है कि लोकतंत्र के इस उत्सव के आगामी चरणों में भी वे बढ़-चढ़कर भाग लेंगे।